उदयपुर की वादियों में अगर इन दिनों कोई सबसे नियमित ‘पर्यटक’ है, तो वो हैं पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया। फर्क बस इतना है कि आम पर्यटक होटल बुक करता है, और यहां पूरा प्रशासन ‘बुक’ हो जाता है। अब सवाल ये नहीं कि कटारिया जी उदयपुर क्यों आते हैं, सवाल ये है कि इतनी बार क्यों आते हैं—क्या यह संवैधानिक जिम्मेदारी है या “घर जैसा सुकून” वाली निजी पसंद?
पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया का उदयपुर से यह विशेष रिश्ता अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन चुका है। लेकिन इस बार मामला इसलिए ज्यादा दिलचस्प है, क्योंकि सवाल उठाने वाला कोई विपक्षी चेहरा नहीं, बल्कि ‘अपने ही घर’ का व्यक्ति है।
उदयपुर के अधिवक्ता, पूर्व पार्षद और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े डॉ. विजय विप्लवी ने देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक विस्तृत पत्र लिखकर कटारिया की कार्यप्रणाली पर गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े किए हैं। यह वही पत्र है, जिसमें उन्होंने बार-बार उदयपुर प्रवास, प्रशासनिक दखल और सार्वजनिक गतिविधियों को लेकर विस्तृत आपत्तियां दर्ज की हैं।
डॉ. विप्लवी—जो खुद भाजपा पृष्ठभूमि से आते हैं और जिन्हें आम बोलचाल में ‘समर्थक वर्ग’ या ‘भक्त’ की श्रेणी में भी रखा जाता है—जब वही व्यक्ति सवाल उठाने लगे, तो मामला सिर्फ राजनीतिक आलोचना नहीं रह जाता, बल्कि यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं अंदरूनी स्तर पर भी असहजता मौजूद है।
पत्र में उन्होंने साफ तौर पर लिखा कि राज्यपाल बनने के बाद कटारिया हर महीने करीब एक सप्ताह या उससे अधिक समय उदयपुर में बिताते हैं। इस दौरान सर्किट हाउस में “जनता दरबार” लगाना, जनसुनवाई करना और फिर स्थानीय प्रशासन व पुलिस को निर्देश देना—इन सबको उन्होंने संवैधानिक सीमाओं से परे बताया है।


यही नहीं, छोटे स्तर के कार्यों जैसे नगर निगम के टेम्पो स्टैंड शेड के लोकार्पण में भागीदारी को भी उन्होंने राज्यपाल पद की गरिमा के अनुरूप नहीं माना। विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में मंच साझा करने पर भी सवाल उठाए गए हैं, जहां राज्य का कुलाधिपति पहले से मौजूद रहता है।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि इन दौरों के दौरान लागू होने वाले सुरक्षा प्रोटोकॉल से आम जनता को ट्रैफिक जाम और असुविधा का सामना करना पड़ता है। साथ ही कुछ विवादित टिप्पणियों और प्रोटोकॉल उल्लंघन के मामलों का हवाला भी दिया गया है।
सबसे अहम बात यह है कि डॉ. विप्लवी ने इस पत्र की प्रतियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और राजस्थान के राज्यपाल को भी भेजी हैं—यानी मामला सिर्फ शिकायत नहीं, बल्कि एक व्यापक संवैधानिक बहस की ओर इशारा करता है।
डॉ. विप्लवी ने तो यहां तक सुझाव दे डाला कि अगर कटारिया जी का उदयपुर प्रेम इतना ही गहरा है, तो उन्हें गुजरात का राज्यपाल बना दिया जाए—कम से कम ‘आवागमन’ का गणित आसान हो जाएगा।
इस पूरे प्रकरण में असली सवाल वही है—क्या संवैधानिक पदों की सीमाएं अब लचीली हो गई हैं, या फिर यह सिर्फ ‘व्यक्तिगत शैली’ का मामला है?
उदयपुर की झीलें तो शांत हैं, लेकिन राजनीतिक हलचल बता रही है कि पानी के नीचे कुछ न कुछ जरूर खदबदा रहा है। kyonki जब सवाल ‘बाहर’ से आते हैं, तो उन्हें राजनीति कहा जाता है… लेकिन जब सवाल ‘अंदर’ से उठने लगें, तो उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है।
अब देखना यह है कि यह ‘उदयपुर कनेक्शन’ सिर्फ एक आदत है या फिर एक ऐसी परंपरा बन रही है, जो आने वाले समय में संवैधानिक सीमाओं की नई व्याख्या लिखेगी।










