महाराष्ट्र की सियासत में बुधवार को एक बड़ा और चौंकाने वाला उलटफेर देखने को मिला। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना (शिंदे गुट) ने राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के साथ हाथ मिला लिया है। यह गठबंधन खास तौर पर कल्याण-डोंबिवली नगर निगम (KDMC) में मेयर पद की राजनीति को लेकर सामने आया है, जहां शिंदे गुट ने अपनी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए मनसे का समर्थन स्वीकार किया।
यह राजनीतिक कदम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि हालिया चुनावों में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने साथ मिलकर मैदान में उतरने की रणनीति अपनाई थी। इसके बावजूद, निर्णायक समय पर मनसे ने उद्धव ठाकरे गुट को झटका देते हुए शिंदे सेना को समर्थन दे दिया। इससे न केवल स्थानीय राजनीति का गणित बदला है, बल्कि राज्य स्तर पर महायुति के भीतर मतभेदों की चर्चा भी तेज हो गई है।
सत्ता का गणित: शिंदे गुट की स्थिति मजबूत
मनसे के समर्थन के बाद शिवसेना (शिंदे गुट) के पास अब कुल 58 पार्षदों का समर्थन हो गया है, जिससे KDMC में उनकी स्थिति बेहद मजबूत मानी जा रही है। 122 सीटों वाली इस नगर निगम में बहुमत का आंकड़ा 62 है। भाजपा ने जहां 50 सीटों पर जीत दर्ज की थी, वहीं शिंदे गुट को 53 सीटें मिली थीं। मनसे के पास 5 सीटें और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के पास 11 सीटें हैं। इस नए समीकरण ने मेयर चुनाव को पूरी तरह से दिलचस्प बना दिया है।
महायुति में दरार या रणनीतिक दांव?
राज्य में भाजपा और शिंदे गुट की शिवसेना मिलकर महायुति सरकार चला रहे हैं, ऐसे में स्थानीय स्तर पर दोनों दलों का आमने-सामने आना कई सवाल खड़े कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम शिंदे गुट की एक रणनीतिक चाल हो सकता है, जिसका उद्देश्य स्थानीय सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखना है, भले ही इसके लिए गठबंधन धर्म से हटकर फैसला क्यों न लेना पड़े।
कल्याण-डोंबिवली का यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में मुंबई महानगरपालिका और अन्य नगर निकाय चुनावों के लिए संकेतक माना जा रहा है। साफ है कि महाराष्ट्र की राजनीति में गठबंधन स्थायी नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहेंगे।










