सिंदूर खेला के साथ माता की विदाई:बंगाली समाज ने खुशी-खुशी किया बेटी को ससुराल विदा, आज होगा माता का विसर्जन

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( उजला दर्पण अंकित सेन )

बंगाली संस्कृति में मां दुर्गा को बेटी माना जाता है, जो दशहरा के दिन अपने मायके से विदा होकर ससुराल लौटती हैं

जबलपुर मध्यप्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर के बंगाली क्लब में गुरुवार को मां दुर्गा की विदाई सिंदूर खेला के साथ हुई है। यहां बड़ी संख्या में पहुंची महिलाओं ने पहले मां दुर्गा की पूजा की और फिर सिंदूर खेला। इसमें ब्राह्मण, पंजाबी सहित अन्य समाज की महिलाएं भी शामिल हुईं। बंगाली समाज की परंपरा है कि महिलाएं अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए मां दुर्गा की विदाई से पहले एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। क्लब 100 साल से आयोजन कर रहा है।

इस अनुष्ठान में महिलाएं सबसे पहले मां दुर्गा की प्रतिमा के माथे और चरणों पर सिंदूर लगाती हैं। इसे मां दुर्गा को विदाई देने का प्रतीक माना जाता है। महिलाएं मां दुर्गा से लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की सुरक्षा का आशीर्वाद मांगती हैं। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, जिसमें माथे, गाल और शंख-पोला (हाथ की पारंपरिक चूड़ियां) शामिल हैं।

यह सौभाग्य और वैवाहिक जीवन में खुशियों की कामना का प्रतीक है। बंगाली संस्कृति में मां दुर्गा को बेटी माना जाता है, जो दशहरा के दिन अपने मायके से विदा होकर ससुराल लौटती हैं। सिंदूर खेला इसी विदाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मासूमा मजूमदार बताती हैं कि विजयदशमी हमारा मुख्य त्योहार है। 10 दिन तक माता हमारे घर में रहती हैं, कहावत यह भी है कि 10 दिनों तक मायके में हमारे साथ माता रहती है और विजयदशमी के दिन बेटी को विदा करने का समय आता है। इस दिन हम एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर माता को हंसी, खुशी के साथ विदा करते हैं। उन्होंने बताया कि अब एक साल तक फिर से माता के घर आने का इंतजार किया जाता है।

श्वेता विजन ने बताया कि भले ही हम पंजाबी हैं पर माता का सिंदूर खेला त्योहार हमें बहुत पंसद है। उन्होंने बताया कि 10वें दिन विदा के समय पत्तों से आंसू पोंछकर उन्हें विदा किया जाता है। उन्होंने बताया कि बहुत समय से मन था कि बंगाली पूजा में शामिल होकर उनके दर्शन करूं।

जबलपुर निवासी उषा दीक्षित का कहना है कि आज सभी के साथ मिलकर मां दुर्गा की पूजा की गई, फिर सिंदूर खेला और खुशी-खुशी माता को विदा किया गया। उन्होंने बताया कि संस्कारधानी में हर समाज की महिलाएं मिलकर कई सालों से पूजा में शामिल हो रहे हैं।

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