विधायक संतोष वरकड़े, सरपंच जीरा बाई मरावी, सचिव प्रिंस दुबे और जबलपुर कलेक्टर — हमारी भी गुहार सुन लो।

राम गोपाल सिंह ऊईके। ।उजला दर्पण मध्यप्रदेश ।
जबलपुर। कुण्डम।
ग्राम लादवर उमरहाई और कोसामडोंगरी पंचायत की हालत इतनी बदतर हो चुकी है कि यहां इंसान की ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं बची। ना सड़क है, ना नाली, ना पुल, ना इलाज की सुविधा।
जनता बार-बार सरपंच जीरा बाई मरावी और सचिव प्रिंस दुबे से गुहार लगा चुकी है — लेकिन हर बार जवाब मिलता है:
> “फाइल अटकी है… जब पास होगी तब देखेंगे।”
क्या अब किसी बच्चे की मौत के बाद ही पास होंगी फाइलें?
👶 बच्चों की पढ़ाई या मौत का सफर?
मासूम बच्चों को हर दिन स्कूल जाने के लिए कीचड़, बहते नाले और बिना पुल वाली नदियों से गुजरना पड़ता है।
ना पक्का रास्ता, ना सुरक्षा।
हर दिन जान का जोखिम —
> “अगर कोई बच्चा बह गया तो क्या सरपंच जीरा बाई मरावी, सचिव प्रिंस दुबे और कलेक्टर जबलपुर जिम्मेदारी लेंगे?”
🚑 बीमारों के लिए गांव बना मौत का गड्ढा
गांव में कोई बीमार हो जाए तो एम्बुलेंस तक नहीं पहुंच सकती।
प्रेग्नेंट महिलाएं, बुज़ुर्ग और मरीज़ तड़पते हैं, लेकिन जिम्मेदार सिर्फ हाथ खड़े कर देते हैं।
🗳️ जनता का गुस्सा: “वोट मांगते हैं, काम पूछो तो गायब हो जाते हैं!”
चुनाव में यही नेता और अफसर हाथ जोड़कर घर-घर पहुंचते हैं।
लेकिन जब गांव कहता है — “हमें सड़क चाहिए, नाली और पुल चाहिए” —7
तो जीरा बाई मरावी, प्रिंस दुबे और प्रशासन तीनों चुप्पी ओढ़ लेते हैं।
> “फाइल लगी है… ऊपर से आदेश आएगा तो करेंगे।”
🔥 क्या आदेश तब आएगा जब कोई बच्चा बहकर मर जाएगा?
📸 तस्वीरें चीख-चीख कर कह रही हैं:
कीचड़ में सने स्कूल जाते बच्चे
बहते नालों में फंसी महिलाएं
तड़पते मरीज़
और आंख मूंदा हुआ प्रशासन
🗣️ गांव की सीधी बात:
> “सरपंच जीरा बाई मरावी और सचिव प्रिंस दुबे सिर्फ कुर्सी पर बैठे हैं या जिम्मेदारी भी समझते हैं?”
“जबलपुर कलेक्टर आखिर किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं?”
“क्या हमें मरना पड़ेगा, तभी सिस्टम जगेगा?”










