दो साल से फाइलों में दबी सड़क! खैरा गांव की मिट्टी में मिल गया स्मार्ट सिटी का वादा!

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सतना से 3 किमी दूर खैरा गांव में बच्चे कीचड़ में गिरते हैं, बुज़ुर्ग फिसलते हैं, और प्रशासन केवल ‘इलाका किसका है’ यही तय नहीं कर पाया!”

सतना।

ये खबर सिर्फ एक गांव की नहीं, सिस्टम की असलियत की तस्वीर है।

सतना शहर से कुछ ही दूरी पर बसा खैरा गांव आज भी सड़क के नाम पर कीचड़ में धंसा है — और इसकी वजह सिर्फ एक है — बेशर्म अफसरशाही और जिम्मेदारी से भागते विभाग।

दो साल पहले रोड निर्माण के लिए टेक्निकल सैंक्शन पास हुआ। सांसद निधि से ₹5 लाख की राशि भी स्वीकृत हो गई। सीवर लाइन का काम भी पूरा। यानी कॉलोनी को स्मार्ट सिटी से जोड़ने की पहली शर्तें पूरी हो गईं।

तो फिर सड़क क्यों नहीं बनी?

क्योंकि नगर निगम कहता है “यह पंचायत का मामला है”, और PWD कहता है “अब ये निगम में आ गया है।”

और इस रस्साकशी में हर दिन खैरा गांव के लोग गिरते हैं — कभी सड़क पर, कभी सिस्टम की बेरुखी के आगे।

बरसात में ये सड़क नहीं, कीचड़ का दलदल बन जाती है।

बच्चों का स्कूल जाना मुश्किल, गर्भवती महिलाओं का निकलना जोखिमभरा, बुज़ुर्गों का चलना नामुमकिन। फिर भी जिम्मेदार अफसरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।

सरपंच ने पत्र लिखा, ग्रामीणों ने निगम और कलेक्टर तक आवाज़ उठाई — लेकिन सब चुप!

अब सवाल ये है कि जब सीवर लाइन निगम ने डाली है, तो सड़क निर्माण से क्यों मुंह मोड़ रहे हो? क्या सतना की सीमाएं सिर्फ वोट के समय याद आती हैं?खैरा गांव को अब भरोसा नहीं आश्वासनों पर — गांववाले कह चुके हैं, अब सड़क नहीं बनी तो ‘घेराव’ होगा — नगर निगम हो या कलेक्ट्रेट!

ये कोई राजनीतिक बयान नहीं, गांव की पीड़ा की अंतिम चेतावनी है।

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