कचरे के ढेरों के बीच स्वच्छता खोजने निकलिए, एक हाथ आंखों पर और दूसरा नाक पर रखना न भूलिए
जबलपुर। यदि भूलवश आपका रास्ता रांझी क्षेत्र की ओर मुड़ जाए और आप स्वच्छता की तलाश में निकल पड़ें, तो पहले से तैयारी कर लीजिए। एक हाथ आंखों पर रखिए ताकि कहीं स्वच्छता दिखाई दे जाए तो पहचान सकें, और दूसरा हाथ नाक पर रखिए ताकि क्षेत्र की ‘सुगंधित व्यवस्थाओं’ का असर स्वास्थ्य पर न पड़े।
नगर निगम के जोन क्रमांक 10 में स्वच्छता की स्थिति इन दिनों ऐसी है कि कचरे के ढेर स्वयं अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। सड़कों के किनारे फैला कचरा, बजबजाती नालियां और बदबू से सराबोर वातावरण मानो यह संदेश दे रहा हो कि स्वच्छता सर्वेक्षण के दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितनी दूरी है।
क्षेत्र के जिम्मेदार सीएसआई अनिल मिश्रा के नेतृत्व में स्वच्छता व्यवस्था का ऐसा अनूठा मॉडल विकसित हुआ है, जिसमें कचरा हटाने की बजाय उसे स्थायी पहचान दिलाने का प्रयास दिखाई देता है। कई स्थानों पर कचरे के ढेर इतने पुराने नजर आते हैं कि वे स्थानीय विरासत घोषित किए जाने की पात्रता रखते हैं।
हालात केवल रांझी तक सीमित नहीं हैं। भानतलैया क्षेत्र में भी नालियों की दुर्दशा और गंदगी के दृश्य आम हैं। वहीं लालमाटी जोन में स्वच्छता के दावे जमीन पर दम तोड़ते दिखाई देते हैं। जगह-जगह जमा कचरा और अवरुद्ध नालियां नागरिकों को यह एहसास कराने के लिए पर्याप्त हैं कि स्वच्छता अभियान कागजों पर कितना सफल और धरातल पर कितना संघर्षरत है।
विडंबना यह है कि नगर निगम स्वच्छता रैंकिंग में बेहतर स्थान प्राप्त करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करता है, लेकिन कई वार्डों में हालात देखकर ऐसा लगता है कि स्वच्छता केवल रिपोर्टों और बैठकों तक सीमित रह गई है। नागरिकों का सवाल है कि जब जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी में यह स्थिति बनी हुई है, तो जवाबदेही आखिर तय किसकी होगी?
कहने को तो शहर स्वच्छता की दौड़ में शामिल है, लेकिन जोन क्रमांक 10 के हालात देखकर लगता है कि यहां स्वच्छता नहीं, बल्कि गंदगी ने अपना स्थायी कार्यालय खोल रखा है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इन हालातों को सुधारने की दिशा में कदम उठाते हैं या फिर कचरे के ढेर ही उनकी कार्यशैली का परिचय देते रहेंगे।
जोन क्रमांक 10 में स्वच्छता का ‘स्वर्णिम युग’!










