








जबलपुर | मां नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं हैं — वो आस्था हैं, संस्कार हैं, जीवन हैं।
लेकिन आज उनकी गोद में बह रहा है गंदा नाला, गंदगी, प्लास्टिक, पेशाब, मल-मूत्र और उस सिस्टम की सड़ांध, जिसे ‘प्रशासन’ कहा जाता है।
ग्वारीघाट, खारीघाट, तिलवारा — हर घाट चीख-चीख कर कह रहा है: “मुझे बचा लो”
लेकिन नेता मौन हैं, अधिकारी लापता, और जनता ठगी हुई।
श्रद्धालु हर रोज आते हैं, डुबकी लगाते हैं, जल भरकर घर ले जाते हैं।
पर क्या उन्हें पता है कि उसी पानी में शहर का गटर घुला हुआ है?
क्या यह सिर्फ लापरवाही है या सुनियोजित अपराध?
नेता जब कुर्सी मांगते हैं, तो मां नर्मदा को माथे पर सजाकर वोट मांगते हैं।
पर जब कुर्सी मिल जाती है, तो नर्मदा घाटों की गंदगी को देखकर आंखें फेर लेते हैं।
ये सिर्फ धार्मिक आस्था का अपमान नहीं — ये एक सभ्यता को धीरे-धीरे मारने की साज़िश है।
अब बात करते हैं घाटों की दुर्दशा की।
नावें जहां-तहां खड़ी हैं, अस्थायी दुकानें घाट के मुहाने पर तंबू ताने बैठी हैं।
श्रद्धालु ना चैन से स्नान कर सकते हैं, ना पूजा।
भीड़, धक्का-मुक्की, बदबू, और दुकानों से उठता कचरा — यही है नर्मदा के घाटों की असल तस्वीर।
और सबसे बड़ा सवाल —
क्या इन नाव वालों और दुकानों का कोई ठिकाना नहीं तय कर सकता प्रशासन?
क्या इतना भी काम नहीं हो सकता कि इनके लिए एक साफ, तय क्षेत्र बना दिया जाए?
जहां श्रद्धालु भी सुकून से आएं, दुकानदार भी सम्मान से कमाएं, और मां नर्मदा की पवित्रता बनी रहे?
लेकिन नहीं…
यह सिस्टम सो रहा है। गहरी नींद में, बेफिक्र, कुंभ करणी निद्रा में
।अब वक्त है सवाल पूछने का — तीखा, सीधा, और सामने से।
कहां हैं नर्मदा को बचाने के वादे करने वाले नेता?
कहां है नगर निगम का वह सिस्टम जो स्वच्छता का तमगा लिए फिरता है?
और सबसे अहम — कब जागेगी वो जनता, जो रोज़ आस्था के नाम पर जहर पी रही है?
अगर अब नहीं उठे, तो नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं खोएगी — हम सब अपनी आत्मा खो देंगे।











