कलेक्टर साहब, आपकी दृष्टि में सम्माननीय पत्रकार कौन—जो सवाल पूछे या जो चाटुकारिता करे?

---Advertisement---

कलेक्टर साहब, आपकी दृष्टि में सम्माननीय पत्रकार कौन—जो सवाल पूछे या जो चाटुकारिता करे?

रीवा में ‘सम्माननीय’ और ‘असम्माननीय’ पत्रकार की चर्चा के बाद उठे सवाल, आखिर पत्रकारिता की कसौटी क्या है?

रीवा। पत्रकारिता का मूल स्वभाव ही सवाल करना है। जब व्यवस्था में कोई कमी दिखाई दे तो उसे सामने रखना, जनता की समस्या को आवाज देना और जिम्मेदारों से जवाब मांगना पत्रकार का दायित्व माना जाता है। ऐसे में रीवा में कलेक्टर के एक कथित बयान में पत्रकारों के लिए ‘सम्माननीय’ और ‘असम्माननीय’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लेकर बहस छिड़ना स्वाभाविक है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—कलेक्टर साहब, आपकी दृष्टि में सम्माननीय पत्रकार कौन है? वह जो प्रशासन के हर फैसले की प्रशंसा करे, हर कार्यक्रम में तारीफ के पुल बांधे और कभी असहज सवाल न पूछे? या वह पत्रकार जो जनता की परेशानी लेकर आपके सामने खड़ा हो और व्यवस्था से जवाब मांगे?

अगर पत्रकार सवाल पूछता है तो क्या वह असम्माननीय हो जाता है?

अगर वह किसी सरकारी व्यवस्था की कमी लिखता है तो क्या उसकी पत्रकारिता की गरिमा कम हो जाती है?

अगर किसी खबर से प्रशासन असहज होता है तो क्या खबर लिखने वाला पत्रकार गलत हो जाता है?

पत्रकारिता का मतलब तालियां बजाना नहीं, सवाल उठाना भी है

पत्रकारिता किसी अधिकारी, सरकार या राजनीतिक दल की प्रशंसा करने का माध्यम मात्र नहीं है। पत्रकार का काम जनता और शासन के बीच सूचना एवं संवाद का सेतु बनना है। जहां जनता की आवाज दब जाती है, वहां पत्रकार उस आवाज को सामने लाता है।

सड़क खराब है तो सवाल होगा।

अस्पताल में सुविधा नहीं है तो सवाल होगा।

किसी कार्यालय में आम आदमी परेशान है तो सवाल होगा।

किसी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंच रहा है तो सवाल होगा।

और यदि प्रशासन ने अच्छा काम किया है तो उसकी खबर भी प्रकाशित होगी।

यही पत्रकारिता का संतुलन है—जहां प्रशंसा भी तथ्य के आधार पर हो और सवाल भी तथ्य के आधार पर।

क्या ‘सम्मान’ का आधार सहमति हो सकता है?

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि किसी पत्रकार की सम्माननीयता आखिर किस आधार पर तय होगी?

क्या वह प्रशासन की पसंद से तय होगी?

क्या उसकी पहचान अधिकारियों के साथ दिखाई देने से होगी?

क्या हर सरकारी कार्यक्रम में उपस्थित रहना उसकी पत्रकारिता की गुणवत्ता का प्रमाण होगा?

या फिर उसके काम की विश्वसनीयता, तथ्य, जनसरोकार और निष्पक्षता उसकी पहचान तय करेंगे?

यदि ‘सम्माननीय पत्रकार’ और ‘असम्माननीय पत्रकार’ जैसी कोई औपचारिक श्रेणी है, तो उसके स्पष्ट मानदंड सार्वजनिक होने चाहिए। आखिर पत्रकारिता कोई सरकारी पद नहीं, जिसकी ग्रेडिंग किसी कार्यालय में बैठकर तय की जाए।

सवाल पूछने वाला पत्रकार असम्माननीय कैसे?

लोकतंत्र में पत्रकार और प्रशासन की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। प्रशासन का दायित्व शासन चलाना है और पत्रकार का दायित्व घटनाओं एवं जनसरोकारों को समाज के सामने रखना।

दोनों के बीच संवाद होना चाहिए, लेकिन संवाद का अर्थ सहमति नहीं होता।

पत्रकार का सवाल अधिकारी का अपमान नहीं है।
पत्रकार की आलोचना प्रशासन के प्रति दुश्मनी नहीं है।
और असहमति को चाटुकारिता के अभाव के रूप में देखना भी पत्रकारिता की स्वतंत्र भूमिका को कमजोर कर सकता है।

इसलिए सवाल व्यक्ति से नहीं, उस सोच से है जिसमें पत्रकार की ‘सम्माननीयता’ को उसकी स्वतंत्र पत्रकारिता के बजाय उसकी सहमति से जोड़कर देखा जाए।

कलेक्टर साहब, एक प्रमाणपत्र तो बनता है!

व्यंग्य में ही सही, यदि पत्रकारों की दो श्रेणियां हैं तो जनता भी जानना चाहेगी—

‘सम्माननीय पत्रकार’ बनने की पात्रता क्या है?
क्या उसके लिए कोई आवेदन होगा?
क्या कोई समिति तय करेगी कि कौन सम्माननीय है?
क्या सवाल पूछने की संख्या भी निर्धारित होगी?
और क्या चाटुकारिता को कोई अतिरिक्त अंक मिलेंगे?

बेशक ये सवाल व्यंग्य हैं, लेकिन इनके पीछे छिपा सवाल बेहद गंभीर है।

पत्रकार का सम्मान उसके सवालों से कम नहीं होना चाहिए।

क्योंकि जिस दिन पत्रकार यह सोचकर सवाल पूछना बंद कर दे कि कहीं उसे ‘असम्माननीय’ न कह दिया जाए, उस दिन नुकसान केवल पत्रकार का नहीं होगा—जनता के उस अधिकार का होगा, जिसके तहत वह व्यवस्था से जवाब चाहती है।

अंततः सवाल यही है—

कलेक्टर साहब, आपकी दृष्टि में सम्माननीय पत्रकार कौन—जो सवाल पूछे या जो चाटुकारिता करे?

क्योंकि पत्रकारिता में सबसे बड़ा सम्मान किसी अधिकारी की प्रशंसा नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को कायम रखना है।

और प्रेस की ताकत उसके माइक की आवाज में नहीं, उस सवाल की धार में होती है जिसे पूछने का साहस वह रखता है।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

Join WhatsApp

Join Now

Leave a Comment