कबाड़ से कमाल… या करोड़ों का खेल? आखिर कहां गायब हो गईं जनता के पैसे से संवारी गईं बसें
रैन बसेरा, बुक बैंक, थैला बैंक, बर्तन बैंक और चेंजिंग रूम के दावे अब सवालों के कटघरे में
जबलपुर। कभी नगर निगम ने पूरे शहर के सामने दावा किया था कि कबाड़ घोषित पुरानी बसों को नया जीवन देकर जनसेवा का अनूठा मॉडल तैयार किया जाएगा। इन बसों को आधुनिक स्वरूप देकर रैन बसेरा, बुक बैंक, थैला बैंक, बर्तन बैंक और महिलाओं के लिए चेंजिंग रूम जैसी सुविधाएं संचालित करने की घोषणा की गई थी। योजनाओं का भव्य शुभारंभ हुआ, फोटो खिंचे, प्रेस विज्ञप्तियां जारी हुईं और इसे नगर निगम की बड़ी उपलब्धि बताया गया।
लेकिन आज वही बसें, वही योजनाएं और उन पर खर्च हुई करोड़ों रुपये की राशि सवालों के घेरे में है।
शहरवासी पूछ रहे हैं कि आखिर वे बसें अब कहां हैं? यदि योजनाएं सफल हैं तो उनकी वर्तमान स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? यदि वे बंद हो चुकी हैं तो उनके संचालन पर खर्च हुआ पैसा किस काम आया? और यदि बसें ही गायब हैं तो उनकी जिम्मेदारी किसकी है?
करोड़ों खर्च हुए… लेकिन लाभ किसे मिला?
नगर निगम ने कबाड़ घोषित बसों का रिनोवेशन कराया। दावा किया गया कि इन बसों के माध्यम से जरूरतमंदों को रात में आश्रय मिलेगा, विद्यार्थियों को किताबें मिलेंगी, प्लास्टिक मुक्त अभियान के तहत थैला बैंक संचालित होगा, सामाजिक आयोजनों के लिए बर्तन बैंक उपलब्ध रहेगा और महिलाओं के लिए चेंजिंग रूम जैसी सुविधा मिलेगी।
प्रश्न यह है कि इन सभी योजनाओं का आज वास्तविक स्वरूप क्या है? कितनी बसें वर्तमान में संचालित हैं? कितनी बंद हो चुकी हैं? कितनी बसें किस स्थान पर खड़ी हैं? क्या उनका उपयोग हो रहा है या वे फिर से कबाड़ बन चुकी हैं?
उद्घाटन तक सीमित रह गई योजनाएं?
शहर में चर्चा है कि जिन योजनाओं को कभी नगर निगम की बड़ी उपलब्धि बताया गया था, वे अब दिखाई नहीं देतीं। न रैन बसेरा सक्रिय नजर आता है, न बुक बैंक की कोई जानकारी मिलती है, न थैला बैंक की चर्चा है, न बर्तन बैंक का संचालन दिखाई देता है और न ही चेंजिंग रूम का उपयोग सार्वजनिक रूप से सामने आता है।
यदि योजनाएं सफल हैं तो नगर निगम उनके संचालन की पूरी जानकारी जनता के सामने क्यों नहीं रखता? यदि योजनाएं बंद हैं तो इसके पीछे कारण क्या हैं?
महापौर और जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी क्यों?
हर छोटे-बड़े विषय पर बयान देने वाले जनप्रतिनिधि और अधिकारी इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं? जनता यह जानना चाहती है कि करोड़ों रुपये से तैयार की गई परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति क्या है? यदि सब कुछ ठीक है तो निरीक्षण कराकर तस्वीरें और संचालन का विवरण सार्वजनिक किया जाए।
जवाबदेही से बचना क्यों?
जनता के टैक्स के पैसे से तैयार की गई किसी भी योजना का उद्देश्य केवल उद्घाटन करना नहीं होता। उसका नियमित संचालन, रखरखाव और जनता को लाभ पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है। यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद योजनाएं बंद हो गईं या बसें गायब हो गईं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सार्वजनिक धन की जवाबदेही का गंभीर विषय भी बन जाता है।
जनता मांग रही है पूरा हिसाब
शहरवासियों की मांग है कि नगर निगम सार्वजनिक रूप से बताए—
- कुल कितनी बसों का रिनोवेशन किया गया?
- प्रत्येक बस पर कितना खर्च हुआ?
- कुल परियोजना लागत कितनी थी?
- वर्तमान में सभी बसें किस स्थान पर हैं?
- कौन-सी योजनाएं संचालित हैं और कौन-सी बंद हो चुकी हैं?
- रखरखाव पर अब तक कितना खर्च किया गया?
- यदि योजनाएं बंद हैं तो जिम्मेदारी किसकी तय की गई?
सवाल अब भी बाकी है…
“कबाड़ से कमाल” का सपना दिखाकर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन यदि वही बसें आज जनता को दिखाई नहीं दे रहीं और योजनाएं धरातल पर नजर नहीं आ रहीं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
आखिर कबाड़ से कमाल हुआ था… या करोड़ों रुपये खर्च कर कमाल ही गायब हो गया?
अब शहर प्रचार नहीं, प्रमाण चाहता है। जनता का पैसा जनता के लिए खर्च हुआ था, इसलिए उसका पूरा हिसाब भी जनता को मिलना चाहिए।









