पत्रकारों की एंट्री पर रोक का आदेश बना विवाद, डीईओ ने कहा- ‘पत्रकार’ शब्द गलती से जुड़ गया

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पत्रकारों की एंट्री पर रोक का आदेश बना विवाद, डीईओ ने कहा- ‘पत्रकार’ शब्द गलती से जुड़ गया

सोशल मीडिया पर वायरल आदेश के बाद मचा बवाल, जिला शिक्षा अधिकारी ने संशोधन कर विवादित शब्द हटाने की घोषणा की।

 

उजला दर्पण | सिंगरौली

 

सिंगरौली जिले की नवपदस्थ जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कविता त्रिपाठी द्वारा पदभार ग्रहण करते ही जारी किया गया एक आदेश विवादों में घिर गया। 25 जून को जारी इस आदेश में जिले के सभी शासकीय विद्यालयों के प्राचार्यों एवं संस्था प्रमुखों को निर्देश दिए गए थे कि बिना सक्षम अनुमति के पत्रकारों एवं आम नागरिकों को विद्यालय परिसर में प्रवेश न दिया जाए। आदेश का उद्देश्य छात्र-छात्राओं की सुरक्षा तथा शासकीय कार्यों में व्यवधान रोकना बताया गया था।

 

आदेश सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। पत्रकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता और प्रशासनिक पारदर्शिता के खिलाफ बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई। मामला तूल पकड़ने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी कविता त्रिपाठी ने अपनी सफाई दी।

 

डीईओ ने बताया कि उनका उद्देश्य किसी भी पत्रकार को खबरों के संकलन से रोकना नहीं था। उनके अनुसार, उन्हें कई महिला प्राचार्यों से शिकायतें मिली थीं कि कुछ अनाधिकृत लोग विद्यालयों में प्रवेश कर वीडियो बनाते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल कर अनावश्यक दबाव बनाते हैं। इसी कारण उन्होंने अनधिकृत व्यक्तियों के प्रवेश पर नियंत्रण संबंधी आदेश तैयार करने के निर्देश दिए थे।

 

कविता त्रिपाठी का कहना है कि आदेश तैयार करते समय लिपिक द्वारा “पत्रकार” शब्द जोड़ दिया गया, जबकि ऐसा कोई निर्देश उन्होंने नहीं दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि विवाद सामने आने के बाद आदेश में संशोधन कर “पत्रकार” शब्द हटाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बतौर जिला शिक्षा अधिकारी यह उनका पहला जिला है और उनकी प्राथमिकता जिले की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाना है, न कि मीडिया की स्वतंत्रता पर किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाना।

 

वहीं, श्रमजीवी पत्रकार संगठन के जिला अध्यक्ष सुग्रीव वर्मा ने इस आदेश का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि जिले के इतिहास में पहली बार किसी जिला शिक्षा अधिकारी ने पत्रकारों के विद्यालय प्रवेश को लेकर ऐसा आदेश जारी किया है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की होती है, ऐसे आदेश गलत संदेश देते हैं।

 

मामले ने अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रशासनिक पारदर्शिता और मीडिया की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पत्रकार संगठनों के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने भी आदेश वापस लेने की मांग उठाई थी। हालांकि डीईओ द्वारा आदेश में संशोधन की घोषणा के बाद विवाद फिलहाल शांत होता नजर आ रहा है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक आदेशों में सावधानी और स्पष्टता की आवश्यकता को एक बार फिर सामने ला दिया है।

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