माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा जीवन मूल्य : डॉ. बारेलाल जैन
साहित्यिक संगोष्ठी में जीवन मूल्यों और पारिवारिक संस्कारों पर हुआ मंथन
सागर। बुंदेलखंड हिंदी साहित्य संस्कृति विकास मंच, सागर द्वारा आयोजित साप्ताहिक साहित्यिक संगोष्ठी में वक्ताओं ने जीवन मूल्यों, पारिवारिक संस्कारों तथा साहित्य की सामाजिक भूमिका पर विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए रीवा के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बारेलाल जैन ने कहा कि माता-पिता की सेवा मनुष्य का सबसे बड़ा जीवन मूल्य है। सत्य, प्रेम, दया, ईमानदारी और समता जैसे मानवीय मूल्य ही समाज को संस्कारित और सभ्य बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन का वास्तविक आनंद भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि मूल्यों को आत्मसात करने में है। वर्तमान समय में परिवार और संस्कारों से जुड़ाव बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। माता-पिता की देखभाल और सम्मान प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक दायित्व है।
संगोष्ठी का संचालन अमित मणिकांत चौबे ने किया, जबकि डॉ. करुणा ठाकुर ने मां सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की। स्वागत उद्बोधन में पूरन सिंह राजपूत ने कहा कि मानव होना भाग्य और कवि होना सौभाग्य की बात है। साहित्यकार समाज की संवेदनाओं का प्रतिनिधि होता है और उसका लेखन सदैव जनहित एवं लोककल्याण के लिए समर्पित रहता है।
कार्यक्रम में अमेरिका से डॉ. श्याम मनोहर सिरोठिया, बड़ा मलहरा से डॉ. देवदत्त द्विवेदी ‘सरस’, टीकमगढ़ से मुन्नालाल मिश्रा, जबलपुर से श्रीमती तरुणा खरे, पवई-पन्ना से रघुवीर तिवारी ‘योगी’, दमोह से श्रीमती विमला तिवारी, पृथ्वीपुर से कल्याण दास साहू सहित अनेक साहित्यकारों ने काव्य पाठ कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
अंत में श्रीमती चित्रा चतुर्वेदी ने आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में अनेक साहित्य मनीषी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे तथा रचनाकारों का उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम का वातावरण साहित्यिक गरिमा, मानवीय मूल्यों और रचनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा।










