“संस्कारधानी की पहचान केवल नाम से नहीं, नागरिकों के संस्कारों से होती है”
स्वच्छ जबलपुर का सपना तभी होगा साकार, जब प्रशासन के साथ जनता भी निभाए अपनी जिम्मेदारी
Jabalpur को यूँ ही संस्कारधानी नहीं कहा जाता। यह वह भूमि है जहाँ माँ Narmada River की पावन धारा बहती है, जहाँ संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की खुशबू हर गली में महसूस होती है। लेकिन आज एक सवाल हर जागरूक नागरिक के मन में उठ रहा है — क्या हम सच में अपने शहर और अपने संस्कारों के प्रति ईमानदार हैं?
शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए नगर निगम प्रशासन दिन-रात मेहनत कर रहा है। विशेष रूप से नगर निगम आयुक्त Ram Prakash Ahirwar जिस समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहे हैं, वह किसी से छिपा नहीं है। सुबह से लेकर देर रात तक शहर के वार्डों, कॉलोनियों और बाजारों का निरीक्षण, तत्काल कार्रवाई, सफाई व्यवस्था की मॉनिटरिंग, अधिकारियों को निर्देश और जनता की समस्याओं का समाधान — यह सब इस बात का प्रमाण है कि प्रशासन स्वच्छता को केवल अभियान नहीं, बल्कि जनआंदोलन बनाना चाहता है।
लेकिन दुख तब होता है जब कुछ पढ़े-लिखे और जागरूक कहलाने वाले लोग ही सड़कों पर चाय के डिस्पोजल, पानी की बोतलें, पॉलिथिन और कचरा फेंकते दिखाई देते हैं। सवाल यह नहीं कि शहर गंदा कौन कर रहा है, सवाल यह है कि क्या हम अपने ही घर समान शहर के प्रति जिम्मेदार हैं?
जिस शहर की पहचान संस्कारों से हो, वहाँ यदि लोग सार्वजनिक स्थानों को कूड़ेदान समझने लगें, तो यह केवल स्वच्छता का नहीं, सोच का भी संकट है। प्रशासन अपना कार्य कर सकता है, सफाईकर्मी रोज सड़कों को चमका सकते हैं, अधिकारी योजनाएँ बना सकते हैं, लेकिन जब तक जनता स्वयं जागरूक नहीं होगी, तब तक स्वच्छता का सपना अधूरा रहेगा।
आज आवश्यकता केवल आलोचना करने की नहीं, बल्कि प्रशासन का साथ देने की है। वर्षों बाद शहर को ऐसा नेतृत्व मिला है जो स्वयं मैदान में उतरकर कार्य कर रहा है। ऐसे में नागरिकों का भी यह कर्तव्य बनता है कि वे अपने शहर के प्रति जिम्मेदारी निभाएँ। यदि हर व्यक्ति केवल इतना संकल्प ले ले कि वह सड़क पर कचरा नहीं फेंकेगा, दूसरों को भी रोकेगा और स्वच्छता को अपनी आदत बनाएगा, तो वह दिन दूर नहीं जब Jabalpur देश के सबसे स्वच्छ शहरों में अपनी मजबूत पहचान बनाएगा।
स्वच्छता केवल सरकारी अभियान नहीं, यह हमारी संस्कृति, हमारी सोच और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
आइए, हम सब मिलकर यह साबित करें कि संस्कारधानी केवल नाम नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार और हमारे संस्कारों की सच्ची पहचान है।
“संस्कारधानी की पहचान केवल नाम से नहीं, नागरिकों के संस्कारों से होती है”
Published On: May 20, 2026 6:27 am

---Advertisement---









