मंत्री का गुस्सा या सत्ता का घमंड? आईएएस अफसर की बेइज्जती से मचा बवाल

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आईएएस अरविंद शाह के साथ कथित अभद्रता ने खोली सत्ता के अहंकार की परतें, प्रदेश की नौकरशाही में उबाल
जबलपुर/भोपाल।
लोकतंत्र की किताब में मंत्री को जनता का सेवक लिखा गया है, लेकिन जब सेवक खुद को सम्राट समझने लगे, तब व्यवस्था की नींव हिलने लगती है। मध्यप्रदेश में लोक निर्माण विभाग के मंत्री राकेश सिंह और जबलपुर स्मार्ट सिटी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अरविंद शाह के बीच उपजा विवाद अब सत्ता के अहंकार की कहानी बन गया है।
आरोप गंभीर हैं— एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को मंत्री निवास बुलाकर कथित रूप से अपमानित किया गया, खरी-खोटी सुनाई गई और दबाव की राजनीति दिखाई गई। सवाल यह नहीं कि विवाद हुआ, सवाल यह है कि क्या मंत्री का बंगला अब प्रशासनिक अदालत बन गया है?
अरविंद शाह प्रशासनिक सेवा के एक जिम्मेदार अधिकारी हैं, जिनका काम व्यवस्था को गति देना है, न कि सत्ता के तापमान को झेलना। यदि किसी कार्य में असहमति थी, तो उसका समाधान व्यवस्था के भीतर था, न कि शक्ति प्रदर्शन के मंच पर।
आईएएस एसोसिएशन का खुलकर सामने आना इस बात का संकेत है कि मामला सामान्य नहीं था। जब नौकरशाही की रीढ़ खुद अपमान महसूस करे, तो समझना चाहिए कि सत्ता का तराजू झुक चुका है।
राजनीति का धर्म संवाद है, लेकिन जब संवाद की जगह दहाड़ ले ले, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। मंत्री पद सम्मान का प्रतीक है, भय का नहीं।
सवाल जनता पूछ रही है—
अगर एक आईएएस अधिकारी सुरक्षित सम्मान नहीं पा रहा, तो आम आदमी की सुनवाई किस चौखट पर होगी?
यह विवाद सिर्फ मंत्री और अधिकारी के बीच नहीं, बल्कि व्यवस्था और वर्चस्व के बीच खिंची लकीर है।
क्योंकि इतिहास गवाह है—
सत्ता का नशा जब सिर चढ़ता है, तो विवेक सबसे पहले उतरता है।
और लोकतंत्र में याद रखा जाता है—
कुर्सी बड़ी नहीं होती, आचरण बड़ा होता है।

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