राजधानी जयपुर में पिछले कुछ दिनों से कड़ाके की ठंड लगातार बढ़ती जा रही है। सर्द हवाओं के साथ तापमान में आई गिरावट ने आमजन के साथ-साथ उन लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं, जिनके पास ठंड से बचाव के पर्याप्त साधन नहीं हैं। ऐसे समय में समाज के संवेदनशील और जागरूक वर्ग द्वारा किए गए सेवा कार्य न केवल जरूरतमंदों को राहत पहुंचाते हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा भी बनते हैं। इसी कड़ी में परमार्थम् फाउंडेशन ने मानवता और करुणा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भीषण सर्दी से राहत देने के उद्देश्य से अपना सप्तम वार्षिक कंबल वितरण कार्यक्रम आयोजित किया।

दिनांक 28 दिसंबर 2025 को जयपुर शहर के दिल्ली बायपास स्थित प्रसिद्ध श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान वहां उपस्थित साधु-संतों को कंबल वितरित किए गए। धार्मिक वातावरण, मंत्रोच्चार और सेवा भावना से ओत-प्रोत इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित मानवता की सेवा ही सच्चा धर्म है।
धर्म और सेवा का पवित्र संगम :
भारतीय संस्कृति में ‘सेवा’ को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। शास्त्रों में कहा गया है— “नर सेवा नारायण सेवा”। यानी मानव की सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना है। श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर जैसे पवित्र स्थल पर कंबल वितरण का यह आयोजन इसी भावना को साकार करता नजर आया। मंदिर परिसर में साधुओं के चेहरे पर संतोष और आंखों में कृतज्ञता साफ झलक रही थी। ठंड से राहत देने वाला एक कंबल उनके लिए केवल वस्त्र नहीं, बल्कि सम्मान, अपनत्व और समाज की संवेदना का प्रतीक बन गया।
कड़ाके की ठंड और समाज की जिम्मेदारी:
हर वर्ष सर्दियों में तापमान गिरने के साथ ही असहाय, वृद्ध, साधु-संत और सड़क किनारे जीवन बिताने वाले लोगों के सामने जीवन रक्षा की चुनौती खड़ी हो जाती है। ठंड केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि जीवन को भी प्रभावित करती है। ऐसे समय में समाज के सक्षम वर्ग और सामाजिक संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। परमार्थम् फाउंडेशन ने यह समझते हुए कि सेवा का सही समय वही होता है जब जरूरत सबसे अधिक हो, इस भीषण ठंड में कंबल वितरण कर राहत प्रदान करने का प्रयास किया।
फाउंडेशन का निरंतर सेवा संकल्प:
इस अवसर पर फाउंडेशन के राष्ट्रीय सचिव पीयूष शर्मा ने बताया कि परमार्थम् फाउंडेशन पिछले कई वर्षों से सामाजिक सरोकारों को केंद्र में रखते हुए सेवा कार्य करता आ रहा है। उन्होंने कहा कि फाउंडेशन प्रति वर्ष जयपुर सहित विभिन्न स्थानों पर जरूरतमंदों के लिए कंबल वितरण, भोजन सेवा और अन्य सामाजिक गतिविधियों का आयोजन करता है। उनका मानना है कि समाज में बढ़ती संवेदनहीनता के दौर में ऐसे प्रयास लोगों के भीतर मानवीय मूल्यों को जीवित रखते हैं।
पीयूष शर्मा ने कहा, “जब हम किसी जरूरतमंद को ठंड से बचाने का छोटा-सा प्रयास करते हैं, तो वह केवल एक व्यक्ति की मदद नहीं होती, बल्कि समाज में करुणा और सहयोग की भावना को भी मजबूत करता है। यही हमारे फाउंडेशन का उद्देश्य है।”
सहयोगियों की सहभागिता
इस कार्यक्रम में परमार्थम् फाउंडेशन के सहयोगीजन, सामाजिक कार्यकर्ता और श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर सेवा कार्य में सहभागिता निभाई और साधुओं को कंबल वितरित किए। आयोजन के दौरान किसी प्रकार का दिखावा नहीं, बल्कि सादगी और सेवा भावना प्रमुख रही। यह दृश्य स्वयं में प्रेरणादायक था कि जब समाज एकजुट होकर किसी नेक कार्य के लिए आगे आता है, तो उसका प्रभाव गहरा और स्थायी होता है।
जागरूकता का संदेश:
यह कंबल वितरण कार्यक्रम केवल राहत पहुंचाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि ठंड के इस मौसम में हर व्यक्ति अपने स्तर पर मदद कर सकता है। यदि प्रत्येक नागरिक एक जरूरतमंद तक गर्म कपड़ा, कंबल या भोजन पहुंचाने का संकल्प ले, तो कई जिंदगियां सुरक्षित हो सकती हैं। यही जागरूकता इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।
भावनात्मक और सामाजिक प्रभाव:
कड़ाके की ठंड में जब कोई अनजान हाथ मदद के लिए आगे बढ़ता है, तो वह केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन को भी गर्माहट देता है। साधुओं के चेहरे पर उभरी मुस्कान और उनके आशीर्वचन इस बात का प्रमाण थे कि सेवा कार्य का मूल्य किसी भी भौतिक संपदा से कहीं अधिक होता है। ऐसे आयोजन समाज में विश्वास, भाईचारे और मानवीय रिश्तों को मजबूत करते हैं।
परमार्थम् फाउंडेशन द्वारा आयोजित यह सप्तम वार्षिक कंबल वितरण कार्यक्रम धर्म, सेवा और मानवता का सजीव उदाहरण बनकर सामने आया। बढ़ती ठंड के बीच जरूरतमंदों को राहत पहुंचाने का यह प्रयास न केवल सराहनीय है, बल्कि अनुकरणीय भी है। यह आयोजन हमें यह याद दिलाता है कि सच्चा धर्म वही है, जो दुख में डूबे व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सके।
आज आवश्यकता है कि समाज का प्रत्येक वर्ग ऐसी पहल से प्रेरणा लेकर आगे आए, ताकि ठंड की यह रातें किसी के लिए अंतिम न बनें, बल्कि सेवा और करुणा की रोशनी से उजास से भर जाएं।











