विजयादशमी केवल एक पर्व या उत्सव भर नहीं है, यह आत्मचिंतन, आत्ममंथन और आत्मशुद्धि का अनुपम अवसर है। दशहरा का वास्तविक संदेश केवल पुतला दहन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह हमें भीतर झाँककर अपने दोषों, दुर्बलताओं और बुराइयों को समाप्त करने की प्रेरणा देता है।
देश के ख्यातनाम राष्ट्रीय प्रेरक प्रशिक्षक एवं लेखक तथा डी एस पी फॉर यू ट्रेनिंग अकेडमी प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक डॉ. संतोष पांडेय का कहना है कि हम हर वर्ष रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की विजय का उद्घोष करते हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि हम रावण को ही बार-बार जीवित करते हैं। क्या यह समय नहीं आ गया है कि हम कभी राम को भी जीवित करें और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें?
रामायण का रावण दस शीशों वाला था, किंतु वे केवल शारीरिक स्वरूप नहीं थे। वे प्रतीक थे – अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, लालच, आलस्य, स्वार्थ, कटु वाणी, नकारात्मक सोच और अधैर्य जैसी दस बुराइयों के। यदि हम केवल पुतले जलाते रहेंगे, तो यह परंपरा एक उत्सव भर बनकर रह जाएगी। लेकिन यदि हम अपने अंतर्मन में झाँककर इन दोषों का दहन करें, तभी दशहरा अपने वास्तविक स्वरूप में सार्थक होगा।
डॉ. पांडेय कहते हैं कि “राम को जीवित करने का अर्थ है अपने भीतर मर्यादा, संयम, सत्य, करुणा, सेवा और त्याग जैसे गुणों का पुनर्जागरण करना।” जब हम अपने क्रोध पर नियंत्रण कर लेंगे, तो रिश्तों की डोर और भी मजबूत होगी। जब हम ईर्ष्या छोड़ देंगे, तो मन में शांति का संचार होगा। जब आलस्य को परास्त करेंगे, तो प्रगति के नए द्वार खुलेंगे। और जब अहंकार त्याग देंगे, तो समाज में सम्मान और सद्भाव स्वतः बढ़ेगा।
इसलिए इस विजयादशमी पर संकल्प लें कि केवल पुतले को नहीं, बल्कि अपने भीतर के रावण को भी जलाएँ। और केवल रावण का दहन ही नहीं, बल्कि राम का अवतरण भी करें। क्योंकि जब राम हमारे भीतर जीवित होंगे, तभी समाज में सच्चा रामराज्य स्थापित हो सकेगा।













