अजय सिंह (चिंटू) | उजला दर्पण, जोबनेर | श्री कर्ण नरेंद्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर में बुधवार को विश्व मृदा दिवस पर ज्ञानवर्धक और भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. डॉ. पुष्पेंद्र सिंह चौहान और विशिष्ट अतिथि विश्वविद्यालय के प्रथम एवं पूर्व कुलगुरु प्रो. डॉ. एन. एस. राठौड़ रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलगीत के साथ किया गया। इस वर्ष की थीम “स्वस्थ शहरों के लिए स्वस्थ मृदा” पर केंद्रित कार्यक्रम में मिट्टी संरक्षण, टिकाऊ कृषि और वैज्ञानिक खेती के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव साझा किए गए।

किसानों के लिए बड़ी घोषणा
कुलगुरु प्रो. डॉ. पुष्पेंद्र सिंह चौहान ने किसानों के हित में एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि महाविद्यालय किसानों को नि:शुल्क मृदा परीक्षण सुविधा उपलब्ध कराएगा। उन्होंने किसानों को फसल चक्र अपनाने, ड्रिप इरीगेशन से पानी बचाने, TDS–EC–pH की समय-समय पर जांच करवाने, सब्जियों में रसायनों का कम उपयोग करने और वर्मी कम्पोस्ट इकाई स्थापित करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मिट्टी सुधार के लिए आवश्यकता अनुसार जिप्सम का उपयोग बेहद लाभकारी होगा।
“भूमि जीवित है, इसकी रक्षा जरूरी”—डॉ. राठौड़
पूर्व कुलगुरु प्रो. डॉ. एन. एस. राठौड़ ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि भूमि एक जीवित इकाई है और निरंतर रसायनों व प्रदूषण से इसकी जीवनशक्ति घटती जा रही है। उन्होंने कहा कि जहाँ मिट्टी में 3–6% कार्बनिक पदार्थ होना चाहिए, वहीं राजस्थान में यह बेहद कम 0.4–0.5% पाया जाता है, जो चिंता का विषय है। उन्होंने वर्षा आधारित क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग, नैनो यूरिया के उपयोग और सॉयल हेल्थ कार्ड आधारित प्रबंधन को अपनाने पर जोर दिया।
अन्य विशेषज्ञों के सुझाव
कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों द्वारा तैयार कृषि फोल्डर का विमोचन भी किया गया।
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अधिष्ठाता डॉ. डी. के. गोठवाल ने रसायनों के दुष्प्रभावों पर चिंता व्यक्त की।
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डॉ. आर. एन. शर्मा ने कहा कि अत्यधिक रासायनिक खाद से मिट्टी की शक्ति लगातार कम हो रही है।
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विभागाध्यक्ष डॉ. के. के. शर्मा ने बताया कि मिट्टी के स्वस्थ रहने पर ही मनुष्य और पशु स्वस्थ रह पाएंगे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रेरणा डोगरा ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. गजानंद जाट द्वारा प्रस्तुत किया गया।
इस आयोजन में विश्वविद्यालय के अधिकारी, वैज्ञानिक, शोधार्थी, छात्र-छात्राएँ तथा लगभग 150 किसान एवं कृषक महिलाएँ शामिल हुईं।
यह कार्यक्रम किसानों के बीच मिट्टी संरक्षण और वैज्ञानिक खेती के महत्व को समझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास साबित हुआ।










