चोरी पकड़ी गई! जेब में थीं सिर्फ दो रोटियां और नमक की पुड़िया”

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( उजला दर्पण संवाददाता सतना )

सतना जिला अस्पताल।

जहाँ जख्म भरने आते हैं लोग, वहीं किसी की आत्मा को ज़ख्मी कर दिया गया। चोरी का आरोप लगा, भीड़ ने घेरा, लात-घूंसे चले, लाठियाँ बरसीं — और जब जेब टटोली गई, तो निकली सिर्फ दो सूखी रोटियाँ और एक पुड़िया नमक।

भोला सा एक ग्रामीण युवक, अस्पताल में अपने बीमार परिजन को देखने आया था। लेकिन भूख, गरीबी और शक के इस दौर में इंसानियत से पहले हमला होता है — शक के आधार पर।

उसे दो युवकों ने चोर ठहरा दिया। न कोई सबूत, न कोई गवाही। बस शक, और उस पर तुरंत न्याय — भीड़ का न्याय।

भीड़ ने लातों से, डंडों से, तमाशबीनों के कैमरों के सामने उसकी बर्बरता से पिटाई की।

“मैं चोर नहीं हूँ,” वो कहता रहा, हाथ जोड़ता रहा।

पर शायद इस देश में अब गरीब की आवाज़ सुनने वाले सिर्फ मोबाइल कैमरे बचे हैं। इंसानियत नहीं।

जब उसे अधमरा कर दिया गया, तो जेब तलाशी गई।

निकली दो रोटियां — जो शायद दिनभर के भूखे पेट की आखिरी उम्मीद थीं।

और नमक — जो ज़ख्मों पर छिड़कने के लिए नहीं, रोटियों के साथ खाने के लिए रखा था।

तलाशी में चोरी नहीं निकली, इंसानियत की हत्या ज़रूर दिखी।

दोनों आरोपी मौके से भाग निकले। पुलिस चौकी अस्पताल से चंद कदमों पर है, मगर रिपोर्ट नहीं हुई।

क्यों?

क्योंकि घायल गरीब था।

क्योंकि उसके पास न रसूख था, न आवाज़।

और अस्पताल की भीड़?

जिसे तमाशा देखना था, उसने कैमरा उठाया।

जिसे हाथ पकड़ना था, उसने मोबाइल पकड़ लिया।

यह सिर्फ सतना की घटना नहीं है। यह उस सोच की कहानी है, जहाँ भूखे इंसान को चोर समझ लिया जाता है।

और जब जेब से रोटी निकले, तब किसी की आँखें नहीं खुलतीं, सिर्फ कैमरा बंद हो जाता है।

क्या अब भूख भी अपराध है?

क्या अब गरीब होना शक की बुनियाद है?

और क्या अब अस्पताल भी इंसानियत के लिए सुरक्षित नहीं रहे?

यह रिपोर्ट सिर्फ खबर नहीं, एक समाज का आइना है। देखना है — कौन अपना चेहरा इसमें पहचान पाता है।

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