नई भूमिका, पुरानी चुनौतियाँ
सतीश पूनिया, जो हाल ही में हरियाणा में भाजपा की जीत के शिल्पकार माने गए, अब राजस्थान की राजनीति में हाशिये पर सरकते से नजर आ रहे हैं। हरियाणा में प्रभारी रहते हुए उन्होंने पार्टी की रणनीति को सफलतापूर्वक लागू किया और भाजपा को सत्ता में वापस लाने में अहम भूमिका निभाई। इसके बावजूद, उन्हें इस जीत का श्रेय नहीं मिला।
हरियाणा में जीत के बाद पूनिया राजस्थान लौट आए, पर वहां नई सरकार के गठन में उनकी भागीदारी नगण्य रही। इससे सियासी गलियारों में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब उनके राजनीतिक करियर में गिरावट आ रही है।
राजस्थान की राजनीति में मुश्किलें
राजस्थान में सतीश पूनिया का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 2019 में प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद, 2023 के विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले उन्हें हटाकर सीपी जोशी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। आमेर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के बावजूद, पूनिया को कांग्रेस के प्रशांत शर्मा से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी उन्हें राजस्थान में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई।
पार्टी की ओर से लोकसभा चुनावों में टिकट मिलने की उम्मीद भी धरी रह गई, और उन्हें हरियाणा का प्रभारी बना दिया गया। वहां, पहले के नतीजे निराशाजनक थे, लेकिन हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा ने बहुमत हासिल किया, फिर भी पूनिया को वैसी पहचान नहीं मिल पाई, जैसी अपेक्षित थी।
गुटबाजी का शिकार या राजनीतिक बदलाव?
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि सतीश पूनिया पार्टी के भीतर गुटबाजी के शिकार हो गए हैं। उनके खिलाफ डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने असहयोग का आरोप लगाया था, और पूनिया समर्थकों को उम्मीद थी कि वे पार्टी के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। लेकिन जब चुनाव में जीत का श्रेय बंटा, तो कहा गया कि चुनाव केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में लड़ा गया था।
अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या पूनिया झुंझुनूं विधानसभा उपचुनाव में उतारे जाएंगे, या उनका राजनीतिक भविष्य अधर में है?










