सरकारी स्कूल का हेडमास्टर बना ‘घर-स्कूल’ का मास्टर, शिक्षा विभाग बना मूक दर्शक!**

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**सरकारी स्कूल का हेडमास्टर बना ‘घर-स्कूल’ का मास्टर, शिक्षा विभाग बना मूक दर्शक!**

सतना जिले के उचेहरा संकुल के शासकीय प्राथमिक स्कूल नौपुला पिपरिकला में हेडमास्टर त्रिवेंद्र मिश्रा ने एक नया इतिहास रच दिया है। जहाँ पूरा शिक्षा विभाग समय पर स्कूल पहुँचने का उपदेश देता है, वहीं यह हेडमास्टर साहब ‘स्कूल आओ-घर जाओ’ के अपने नियम से चलते हैं। सुबह हाजिरी लगाकर घर जाना और छुट्टी के वक्त वापस आकर रजिस्टर पर हस्ताक्षर करना – यही बन गया है इनका दिनचर्या का हिस्सा।

जबकि इसी स्कूल की दो शिक्षिकाओं को जिला कलेक्टर के आदेश के बावजूद एक घंटे देरी से आने पर कारण बताओ नोटिस( 24 अप्रैल) झेलना पड़ा, लेकिन जब 27 अप्रैल को उजाला दर्पण टीम ने स्कूल पहुंची तो पाया कि , हेडमास्टर महोदय का रोजाना स्कूल से गायब रहना किसी रहस्य से कम नहीं है। बच्चों की मासूम जुबान से निकला सच और भी चौंकाने वाला है – “सर तो रोज चले जाते हैं… हमें पढ़ाने नहीं आते।”

सबसे दुखद पहलू यह है कि जब उजाला दर्पण की टीम ने इस मामले की पड़ताल की तो शिक्षिकाओं के चेहरे पर साफ झलक रहा था डर। न वे कुछ बता पाईं, न ही सच उगल पाईं। क्या यही है हमारी शिक्षा व्यवस्था की हकीकत, जहाँ जूनियर स्टाफ को डराकर चुप करा दिया जाता है और वरिष्ठ अधिकारी मनमर्जी करते हैं?

सवाल यह उठता है कि क्या संकुल समन्वयक को इसकी जानकारी नहीं या फिर वे जानबूझकर आँखें मूंदे बैठे हैं? जिला शिक्षा अधिकारी का कार्यालय इस मामले में क्यों मौन है? क्या शिक्षा मंत्रालय तक यह खबर पहुँची है या फिर उन्हें भी इसकी जानकारी नहीं?

हमारी मांग स्पष्ट है – हेडमास्टर त्रिवेंद्र मिश्रा का तत्काल निलंबन, संकुल समन्वयक और जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका की जाँच और शिक्षिकाओं को दिए गए नोटिस की वापसी। इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई तो हम इस मामले को राज्य मानवाधिकार आयोग तक ले जाएँगे।

शिक्षा के नाम पर हो रहे इस खिलवाड़ को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। जनता का पैसा और बच्चों का भविष्य दोनों इस व्यवस्था की भेंट चढ़ रहे हैं। समय आ गया है कि शिक्षा विभाग इस मामले में ठोस कार्रवाई करे और साबित करे कि नियम सबके लिए एक समान हैं।

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