“ये है न्यू इंडिया की सच्चाई”—इस पंक्ति में जितना गर्व छिपा है, उतना ही व्यंग्य भी। प्रयागराज में जब गंगा और यमुना का संगम रौद्र रूप में बहा, तो पानी में न सिर्फ गांव, सड़कें और मकान बह गए, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही भी बहती नजर आई।

200 से अधिक गांव जलमग्न हो गए, हज़ारों परिवार विस्थापित हो गए, लेकिन अफसोस की बात ये है कि प्रशासन और कुछ पुलिस अधिकारी ज़मीनी हकीकत को समझने के बजाय सोशल मीडिया पर धार्मिक नाटकीयता में व्यस्त दिखे। एक वायरल वीडियो में एक दरोगा जी को देखा गया, जो अपने घर में घुसे बाढ़ के पानी में गंगा मैया को फूल और दूध चढ़ा रहे हैं। कैमरा एंगल भी सेट है, भाव-भंगिमा भी, और संवाद—“हर हर गंगे!”।
लेकिन इस वायरल श्रद्धा में वो खतरा छिपा था, जिसे नजरअंदाज़ करना लापरवाही नहीं, बल्कि आपराधिक गैर-जिम्मेदारी कहा जाएगा। घर की बिजली चालू थी, पानी बढ़ रहा था, और ऐसे में अगर करंट फैलता, तो न केवल वह घर, बल्कि आस-पास का पूरा मोहल्ला उसकी चपेट में आ सकता था। ऐसे में क्या यह आस्था थी या आत्म-प्रदर्शन?
प्रशासन को कई दिन पहले बाढ़ की चेतावनी मिल चुकी थी। IMD की रिपोर्ट्स थीं, NDRF की तैनाती की संभावनाएं थीं, मगर तैयारियां नदारद थीं। न कहीं कोई बचाव केंद्र खुला, न लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। सड़कें जलमग्न हैं, लोग नाव से आवाजाही कर रहे हैं, महिलाएं बच्चों को कंधों पर उठाकर गंदे नालों को पार कर रही हैं, और शहर का स्मार्ट सिटी टैग—सिर्फ होर्डिंग्स में झिलमिला रहा है।
जो प्रयागराज हर साल करोड़ों रुपये के आयोजन करता है, क्या वहां एक बाढ़ अलर्ट सिस्टम नहीं होना चाहिए था? क्या बाढ़ नियंत्रण की स्थायी रणनीति नहीं बननी चाहिए? और अगर बनी भी है, तो वह फाइलों और मीटिंग्स में ही क्यों दबी रह गई?
पुलिस और प्रशासन के अधिकारी, जो आपदा के समय में जनता की सहायता के लिए तैनात होते हैं, क्या उनकी भूमिका सिर्फ सोशल मीडिया पर वीडियो डालना है? क्या “हर हर गंगे” पोस्ट करना अब ड्यूटी का हिस्सा बन गया है, और राहत कार्य सिर्फ जनता की किस्मत पर छोड़ दिया गया है?
सरकार, प्रशासन, और नगर निगम—तीनों ही संस्थाएं बाढ़ प्रबंधन में पूरी तरह फेल नजर आईं। राहत की उम्मीद में आंखें लगाए लोगों को सिर्फ बहाने, ट्वीट्स और धार्मिक वीडियो मिले। ज़मीन पर कार्रवाई नदारद रही।
समस्या ये नहीं कि बाढ़ आई, समस्या ये है कि बाढ़ हर साल आती है, और हर साल सिस्टम उसे भूल जाता है। धर्म के नाम पर भक्ति तो ठीक है, पर जब सरकारी अधिकारी संकट में धार्मिक प्रदर्शन करें और प्रशासनिक कर्तव्यों को त्याग दें, तो यह सवाल पूछना ज़रूरी है—क्या इस “न्यू इंडिया” में ज़िम्मेदारी सिर्फ एक शब्द बनकर रह गई है?
प्रश्न बड़ा है, और जवाबों का इंतजार लंबा। पर अगर जनता चुप रही, तो अगली बार ये बाढ़ सिर्फ घरों में नहीं, लोकतंत्र की नींव में भी घुसेगी।










