बिहार की राजनीति और सामाजिक सेवा में एक ऐसा नाम है, जो सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि अपने कर्मों से पहचाना जाता है — पप्पू यादव। कभी 9000 बीघा ज़मीन के मालिक रहे, आज उनके पास मुश्किल से 1 बीघा ज़मीन और एक पुराना घर बचा है। लेकिन इस कमी में भी वे खुद को दिल से करोड़पति मानते हैं, क्योंकि उन्होंने अपना जीवन और संपत्ति दोनों जरूरतमंदों के नाम कर दी।
कोविड और बाढ़ में बने मसीहा
कोविड महामारी के सबसे कठिन दौर में, जब लोग अपनों तक का साथ खो रहे थे, पप्पू यादव आगे बढ़कर हजारों परिवारों की मदद में जुट गए। उन्होंने 90 कट्ठा ज़मीन बेचकर करीब 5 करोड़ रुपये खर्च किए — राशन बांटने, ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध कराने, दवाइयों, अस्पताल के खर्च, एंबुलेंस सेवा और यहां तक कि अंतिम संस्कार तक का खर्च उठाने में। कई बार तो वे स्वयं पीपीई किट पहनकर अस्पताल पहुंचे और मरीजों की जान बचाई।
बिहार और उत्तर प्रदेश में बाढ़ के दौरान भी उन्होंने अद्वितीय सेवा की मिसाल पेश की। सैकड़ों गांव जलमग्न होने और हजारों लोग बेघर होने पर, उन्होंने 5 बीघा ज़मीन बेचकर 3 करोड़ रुपये राहत कार्यों में लगाए। नाव, राशन, टेंट, कपड़े, दवाइयां और पुनर्वास तक की व्यवस्था की। कई स्थानों पर अस्थायी स्कूल और अस्पताल भी शुरू करवाए।
35 साल का सार्वजनिक जीवन, 300 करोड़ की सेवा
अपने 35 वर्षों के सार्वजनिक जीवन में, पप्पू यादव अब तक 300 करोड़ रुपये से अधिक समाज के उत्थान में लगा चुके हैं। वे हर रोज़ औसतन 10 लाख रुपये की मदद विभिन्न रूपों में करते हैं।
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40,000 से अधिक गरीब छात्राओं की शिक्षा का जिम्मा उठाया।
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700 से अधिक विधवाओं को हर माह भत्ता दिया।
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150 से अधिक गंभीर रोगियों का इलाज अपने खर्च पर कराया।
उनकी रसोई हर दिन 500 से अधिक लोगों को मुफ्त भोजन देती है — चाहे कोई भिखारी हो, रिक्शावाला हो या बेसहारा बुजुर्ग, उनके दरवाजे से कोई भूखा नहीं लौटता। एक वाहन शहरभर में घूमकर बेघर लोगों को खाना पहुंचाता है। हर रविवार गरीब बच्चों को पौष्टिक आहार और शिक्षा सामग्री दी जाती है।
जो था, वो लोगों का था
आज उनके पास सिर्फ 1 बीघा ज़मीन और एक पुराना घर है, लेकिन उन्हें इसका कोई मलाल नहीं। उनका कहना है,
“मेरे पास जो भी था, वो लोगों का था। भगवान ने मुझे सिर्फ माध्यम बनाया।”
पप्पू यादव का जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर एक इंसान ठान ले, तो अकेले भी समाज की दिशा बदल सकता है। उन्होंने नाम या सम्मान के लिए नहीं, बल्कि सेवा को ही अपना धर्म माना।
आज वे किसी सरकारी अवार्ड या मीडिया प्रचार से दूर हैं, लेकिन आम जनता उन्हें मसीहा मानती है। उनकी कहानी हर भारतीय के लिए प्रेरणा है — कि सच्ची संपत्ति पैसे में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में होती है।










