होली की मंगल कामनाओं के साथ………….
कहो होलिका जलते-जलते
जब से हमने होश सम्हाला तब से देखा दहन तुम्हारा
कहो होलिका जलते-जलते तुमने खुद को बहुत निखारा
यूँ तो वर्ष सहस्त्रों बीते अघो-तमों की रातों में
अहंकार के अट्टाहस थे धर्म नहीं था बातों मे
धर्म बहुत उद्वेलित था और पाप वृहत करता विस्तार
यज्ञ-बेदी बलि-बेदी बनकर करती थी तब हाहाकार
इससे मुक्ति पाने महि ने कातर स्वर में उसे पुकारा
कहो होलिका जलते-जलते तुमने खुद को बहुत निखारा
आयुष्मान हुआ कभी न अत्याचारी-व्याभिचारी
विवश उसे होना पड़ता है अपने जन की लख लाचारी
पुण्य कभी न बोझिल होते लेकिन पाप भूमि पर भारी
मुक्ति दिलाने युगों-युगों से यह सृष्टि उसकी बलिहारी
यही आश विश्वास दिलाती अब भी है वह तारन हारा
कहो होलिका जलते-जलते तुमने खुद को बहुत निखारा
जब भी निशाचरी कृत्यों से बसुधा आकुल हो जाती है
मानवता पद-पीड़ित होकरदीन हीन हो सो जाती है
तब ही हिरण्यकश्यप खुद ही अपना नाश निमन्त्रित करते
सृष्टि के सृजक सृष्टि को अपने हाथ नियंत्रित करते
शुभ निमन्त्रण खुद हो जाता नारायण जब करे निहारा
कहो होलिका जलते-जलते तुमने खुद को बहुत निखारा
प्रह्लादी-सत्याग्रह भू पर मानव को देते यह सीख
विवश हुआ वह भी आने पर निर्दोषों की सुनकर चीख
देख नहीं सकता ‘कयाधु’ के बेटों का वह जीवन अंत
हिरण्यकश्यप असमर्थ हैं कहाँ है उसका अंत-अनंत
आ जाता वह’नरसिंह’बनकर इस जगती का परम सहारा
कहो होलिका जलते-जलते तुमने खुद को बहुत निखारा
वरदानों की कोई महिमा भक्तों को न मिटा सकेगी
अटल हैं जो प्रह्लाद सरीखे तिल भर भी न हटा सकेगी
जलना होगा होलिकाओं को होली देती यह सन्देश
सदियों से इसका अनुगायन अब भी करता भारत देश
इसकी खातिर परम् ब्रम्ह ने बार-बार खुद को अवतारा
कहो होलिका जलते-जलते तुमने खुद को बहुत निखारा
काश कि ध्रुव-प्रह्लाद भाव से देश के बेटे प्रेरित हों
सत्याग्रह के अटल भाव से अन्तः से अनुप्रेरित हों
एक नहीं कई हिरण्यकश्यप होलिकाओं के साथ यहाँ
और ‘कयाधुएं’ बेवश होकर रोती मलती हाथ यहाँ
आज भारती करे प्रतीक्षा आ जाये फिर से हरकारा
कहो होलिका जलते-जलते तुमने खुद को बहुत निखारा
-निरंद सिंह “नीर”












