नई दिल्ली — अगर भारत में कानून का देवता कहीं बैठा है, तो वो अब आंखों पर पट्टी नहीं, नोटों की मोटी परत बांधकर बैठा है। सुप्रीम कोर्ट में एक गरीब महिला की कहानी ने उस खोखली और सड़ी हुई व्यवस्था का परदा फाड़ दिया है जिसे अब भी कुछ लोग “न्याय प्रणाली” कहने की ज़िद करते हैं।
पश्चिम बंगाल की उस महिला का जुर्म क्या था? सिर्फ इतना कि वो गरीब थी। एक टूटी झोपड़ी में रहती है — न पक्का घर, न दरवाज़ा, न छत — सिर्फ उम्मीद थी, और वो उम्मीद भी देश की अदालतों ने उसकी रग-रग निचोड़कर छीन ली।
इंसाफ की तलाश में निकली थी, लेकिन कोर्ट-कचहरी में उसे लूटा गया जैसे जंगल में भेड़ियों का शिकार होता है।
वकीलों ने फीस के नाम पर 40,000 ऐंठे
केस “पक्का जीताने” के नाम पर 10,000 और
चार्जशीट की कॉपी — 20,000
डुप्लीकेट कागज़ों के लिए 7,000
एक दलाल को सिर्फ “जमानत का वादा” करने के लिए 18,000
हाईकोर्ट में खर्च — 1.4 लाख
सुप्रीम कोर्ट में दाखिला और वकील की फ्लाइट के लिए भी 25,000 फूंक दिए
ये न्याय नहीं था — ये खुला डकैती था, जो कोर्ट के गेट के अंदर अंजाम दी गई।
सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने माना — इस महिला को बर्बाद किया गया। हर कदम पर ठगा गया। उसका गुनाह सिर्फ ये था कि वो इस देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा कर बैठी।
अब सवाल देश से है — क्या गरीब को न्याय पाने के लिए अपनी रोटी, तन, आत्मा और खून सब गिरवी रखना होगा?
क्या अदालतें अब कानून की किताब नहीं, रेट कार्ड लेकर बैठती हैं?
अगर ये सिस्टम चलता रहा, तो आने वाले वक्त में लोग संविधान की किताब नहीं उठाएंगे — वो हाथ में पत्थर उठाएंगे। क्योंकि जब कानून गरीब का नहीं होता, तो इंकलाब उसका आखिरी रास्ता बनता है।
यह मामला एक आखिरी चेतावनी है — या तो व्यवस्था बदलेगी, या फिर जनता इसे जला देगी।
क्योंकि अब गरीब इंसाफ नहीं मांगेगा — हिसाब मांगेगा।










