J&K पहलगाम आतंकी हमला: दर्द, अविश्वास और सवालों के बीच डूबा भारत

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“जब धर्म पूछकर गोलियाँ चलाई जाती हैं, तब इंसानियत का जनाज़ा निकलता है।”

देश आज फिर एक बार सदमे में है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने न सिर्फ निर्दोषों की जान ली, बल्कि करोड़ों भारतीयों के दिलों में एक बार फिर अविश्वास का जहर भर दिया है।

सूरत से आए सैलानी शैलेशभाई अपनी पत्नी शीतलबेन के साथ पहलगाम घूमने आए थे।
लेकिन लौटे… तो एक शव बनकर। गवाह बनीं गोलियाँ, और चीखें। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आतंकी सामने आए — और धर्म पूछने के बाद सिर्फ हिंदुओं को गोली मारी।
यह हमला एक ऐसे पर्यटन स्थल पर हुआ जहाँ न सेना का पहरा था, न पुलिस की मौजूदगी, न मेडिकल इमरजेंसी सुविधा।

शीतलबेन, जो इस हादसे की साक्षी रहीं, ने अपने पति की मौत के बाद भी हिम्मत नहीं खोई। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल के सामने उन्होंने सवालों की बौछार कर दी:

“अगर सरकार सिर्फ वीआईपी की सुरक्षा करना चाहती है, तो टैक्स देने वालों की जान की कीमत क्या है?” उनका गुस्सा सिर्फ एक पत्नी का रोष नहीं था — वह करोड़ों भारतीयों का सवाल बन चुका है।

पीड़ा से पाखंड तक का सफर

हमले के बाद कैंडल मार्च हुए, नारों की गूँज उठी।
लेकिन क्या कोई भी ईमानदारी से इन सवालों का सामना कर रहा है?

हमले के बाद ऐसी खबरें आईं कि कई स्थानीय दुकानदार और फेरीवाले गायब हो गए।
सवाल उठता है — क्या उन्हें इस हमले की पहले से भनक थी? क्या आतंकी स्थानीय समर्थन से फल-फूल रहे हैं?

यही सबसे बड़ा पाखंड है — वही लोग बाहरी सैलानियों का विरोध करते हैं, लेकिन उन्हीं से होने वाली कमाई पर पलते हैं।

विचारधारा की लड़ाई — सिर्फ गोलियों की नहीं

इस हमले का तरीका हमें इज़राइल में हमास द्वारा किए गए हमलों की याद दिलाता है।
कट्टरपंथी सोच, धर्म के नाम पर हत्या, और तथाकथित ‘मध्यमार्गी’ समुदाय की चुप्पी — एक भयावह पैटर्न बन चुका है।

जब धर्म के नाम पर गोलियाँ चलाई जाती हैं, तो कुछ तबके खामोश रहते हैं।
लेकिन जब कोई कट्टरता के खिलाफ़ सवाल उठाता है, तो वही लोग “धर्म खतरे में” कहकर सड़कों पर उतर आते हैं।
मुर्शिदाबाद में वक्फ संशोधन बिल के विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शनों को भुलाया नहीं जा सकता।

पड़ोसी दुश्मनों से ज़्यादा खतरा भीतर छिपे ज़हर से

हमें सालों से सिखाया गया है कि पाकिस्तान जैसे देश भारत में आतंकवाद फैला रहे हैं।
यह सच है। लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि इस ज़हर को पनाह हमारे ही बीच कुछ समुदायों में मिली है।

90 के दशक में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार सिर्फ बाहरी आतंकियों ने नहीं किया था — पड़ोसियों ने पड़ोसियों को मारा था।
आज वही कहानी नए चेहरे और नए हथियारों के साथ दोहराई जा रही है।

राजनीति, मानवाधिकार और वोट बैंक का घिनौना खेल

आतंकवादी मरेंगे, सेना कार्रवाई करेगी, कुछ दिनों में एयरस्ट्राइक होगी।
लेकिन फिर विपक्ष मानवाधिकार की दुहाई देगा — जैसे हर बार होता आया है।
सवाल ये है:
क्या जो निर्दोषों की हत्या करते हैं, वे मानवाधिकार के हकदार हैं?

सच यही है —

“आतंकवाद को चुनने वाले अपने सारे अधिकार खो देते हैं। न दया के पात्र हैं, न अंतिम संस्कार के।”

कहानी अभी खत्म नहीं हुई

सरकार बदलेगी या रहेगी, नीतियाँ बदलेंगी या बनेंगी, लेकिन अगर विचारधारा नहीं बदली,
तो फिर एक नया बुरहान वानी पैदा होगा,
फिर एक नया हमला होगा,
फिर एक नया कैंडल मार्च निकलेगा।
और हमसे फिर उम्मीद की जाएगी — कि हम सब कुछ भूल जाएँ।

अंत में, एक सच्चाई — कविता के रूप में

“हर शहीद की चिता से जन्म लेगा एक सपूत,
हर आँसू से जन्म लेगी एक नई प्रतिज्ञा।
जो देश के लिए जिएगा, जो देश के लिए मरेगा —
और फिर से इतिहास लिखेगा खून से, सूरज की रौशनी में।”

सच जानिए, सवाल पूछिए, जागते रहिए।जय हिंद। वंदे मातरम्।

लेखक: बी. एल. मान

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