Jaipur का ट्रैफिक—एक शहर की पहचान बदलते हुए संकट की दास्तान!

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जयपुर—वह शहर जिसकी पहचान कभी हवामहल, आमेर और गुलाबी नगरी की खूबसूरती थी—आज धीरे-धीरे अपनी छवि खोता जा रहा है। इसका नया परिचय कुछ और नहीं, बल्कि हर दिन होने वाला अंतहीन जाम बन गया है। सुबह से रात तक न तो सड़कों में सांस लेने की जगह बची है, न यातायात में अनुशासन की कोई छाया दिखाई देती है। अतिक्रमण, ठेले वालों की मनमानी, ई-रिक्शा का अनियंत्रित संचालन, और प्रशासन की लगातार अनदेखी—जयपुर का ट्रैफिक आज इसी त्रासदी के बीच सिसक रहा है।

पुरानी गलतियां लौट आईं—चारदीवारी फिर अतिक्रमण की गिरफ्त में
अशोक गहलोत के प्रथम कार्यकाल में जोहरी बाजार सहित चारदीवारी के अनेक बरामदे बड़ी मेहनत से अतिक्रमण मुक्त किए गए थे। युवा अफसर मंजीत सिंह और पवन अरोड़ा की जोड़ी ने इस ऑपरेशन को सफल बनाकर शहर को राहत दी थी। लेकिन आज वही बरामदे फिर अवैध कब्जों में जकड़े खड़े हैं। पुरोहितजी का कटला हो या चारदीवारी की गलियाँ—स्थिति इतनी भयावह है कि आगजनी जैसी स्थिति बन जाए तो दमकल को अंदर प्रवेश करना भी असंभव हो जाएगा।

हर साल 1.40 लाख नए वाहन—और केवल 1,498 ट्रैफिक जवान
जयपुर हर साल 1.40 लाख नए वाहनों का बोझ झेल रहा है, जिनमें से 70% से अधिक दोपहिया हैं। ओटीएस, रामबाग सर्किल, गोपालपुरा पुलिया और अम्बेडकर सर्किल जैसे मार्ग प्रतिदिन 15–20 लाख वाहनों का दबाव सहन करते हैं।
बीपीआरडी मानकों के विपरीत, जयपुर में जहाँ एक ट्रैफिक जवान पर 850 वाहन होने चाहिए, वहाँ एक जवान के हिस्से 3,500 से 4,500 वाहन आ रहे हैं। शहर के 403 सर्किलों और चौराहों पर स्वीकृत 2,935 पदों के मुकाबले सिर्फ 1,498 जवान तैनात हैं—यानी 72% की भारी कमी। 156 पॉइंट पर तो कोई पुलिसकर्मी ही नहीं है।

रामबाग से जेपी फाटक—शहर की नसें थमी हुईं
रामबाग सर्किल रोज़ाना जाम का प्रतीक बन चुका है। होटल रामबाग के सामने संकरा मार्ग और फुटपाथ की गलत चौड़ाई नारायण सिंह सर्किल की ओर जाने वाले मार्ग को एक स्थायी bottleneck बना चुकी है। इसी तरह सहकार मार्ग का जेपी फाटक ठेलों और अवैध कब्जों की वजह से हर शाम घंटों तक जाम का गवाह बनता है।

ई-रिक्शा और निजी वाहनों की बाढ़ ने व्यवस्था को पंगु कर दिया
बिना नियमों के चल रहे ई-रिक्शा, मनमाने तरीके से रुकना-चलना, गलत पार्किंग—हर सड़क को अवरुद्ध कर रहे हैं। हालात इतने विस्फोटक हो चुके हैं कि प्रशासन की जरा सी भी ढिलाई शहर को ठहराव की कगार पर ला देती है।

सरकारी योजनाएँ—दिशा सही, क्रियान्वयन का इंतज़ार
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने हाल ही में ट्रैफिक सुधार को लेकर उच्च स्तरीय बैठक की। एक विस्तृत कार्ययोजना बनाई गई है, जिसमें—

  • वन-वे ट्रैफिक मॉडल

  • बस स्टैंडों का स्थानांतरण

  • मल्टी-लेवल पार्किंग

  • जोन आधारित ई-रिक्शा सिस्टम

  • प्रमुख सड़कों को सिग्नल फ्री बनाना

  • जब्त रिक्शाओं के लिए यार्ड
    जैसी पहलें शामिल हैं।

इनके साथ-साथ सख्त प्रवर्तन, अतिक्रमण विरोधी अभियान और पार्किंग प्रबंधन को मजबूत बनाने के निर्देश भी दिए गए हैं।

समस्या सिर्फ बड़े चौराहों की नहीं—कॉलोनियों तक घुस चुका जाम
बड़े सर्किलों पर तो जवान तैनात हैं, लेकिन कॉलोनियों, छोटे कट्स और आंतरिक मार्गों में जाम एक स्थायी बुराई बन चुका है। वीवीआईपी मूवमेंट और बारिश के मौसम में तो स्थिति कई किलोमीटर तक बिगड़ जाती है। शहर की मॉनिटरींग प्रणाली और पार्किंग व्यवस्था लंबे समय से स्थायी समाधान मांग रही हैं।

नतीजा—जयपुर अब पर्यटन नहीं, ट्रैफिक के लिए सुर्ख़ियों में
अगर प्रशासन ने इस दिशा में कठोर कदम नहीं उठाए, तो गुलाबी नगरी अपनी रफ़्तार के साथ-साथ अपनी पहचान भी खो देगी। अतिक्रमण मुक्त सड़कें, पर्याप्त पुलिसबल, सख्त प्रवर्तन और वैज्ञानिक ट्रैफिक प्लानिंग—ये चार स्तंभ आज जयपुर के भविष्य को बचाने की अनिवार्य शर्तें बन चुके हैं।

जयपुर की सड़कें अब सिर्फ जाम नहीं झेल रहीं—वे एक शहर की धड़कन और गरिमा बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं।
और फिलहाल यह लड़ाई बिना किसी धनी धोरी के लड़नी पड़ रही है।

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