नौतपा की भीषण गर्मी के बावजूद मानव कल्याण के लिए महात्मा अग्नि तप साधना में लीन होकर पिछले 7 दिन से तपस्या में लीन है। अग्नि-तप साधना में लीन संत शिरोमणि सूर्य देवगिरी महाराज (फक्कड़ बाबा) जूना अखाड़ा सम्प्रदाय से है।
एक ओर गर्मी अपना हठ नहीं छोड़ रही, तो दूसरी ओर ये महाशय भी हठ पकड़े बैठे हैं.. ना.. ना.. कुछ गलत ना समझियेगा… दरअसल ये हठ योगी है जो हठ योग से मानव कल्याण हेतु तप साधना कर रहे हैं।
नौतपा की भीषण गर्मी के बावजूद मानव कल्याण के लिए महात्मा अग्नि तप साधना में लीन होकर पिछले 7 दिन से तपस्या में लीन है। अग्नि-तप साधना में लीन संत शिरोमणि सूर्य देवगिरी महाराज (फक्कड़ बाबा) जूना अखाड़ा सम्प्रदाय से है। जिन्होंने 11 दिवस तक अग्नि-तप कर मानव कल्याण हितार्थ संकल्प लिया है। अग्नि तपस्या 4 जून को पूरी होगी।
एक ओर गर्मी अपना हठ नहीं छोड़ रही, तो दूसरी ओर ये महाशय भी हठ पकड़े बैठे हैं.. ना.. ना.. कुछ गलत ना समझियेगा… दरअसल ये हठ योगी है जो हठ योग से मानव कल्याण हेतु तप साधना कर रहे हैं।
क्या है हठ योग का अर्थ :-
हठप्रदीपिका नामक ग्रंथ में, “हठ” का अर्थ इस प्रकार दिया है-
हकारेणोच्यते सूर्यष्ठकार चन्द्र उच्यते।
सूर्या चन्द्रमसोर्योगात् हठयोगोऽभिदीयते॥
यहां ‘ह’ का अर्थ- सूर्य तथा ‘ठ’ का अर्थ- चन्द्र बताया गया है। सूर्य और चन्द्र की समान अवस्था ही (सूर्य-चन्द्र का योग) हठयोग है।
अतार्थ शरीर में बहत्तर हजार (72000) नाड़ियाँ हैं। उनमें तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन है, वे हैं :-
सूर्यनाड़ी अर्थात् पिंगला, जो दाहिने स्वर का प्रतीक है।
चन्द्रनाड़ी अर्थात् इड़ा, जो बायें स्वर का प्रतीक है।
इन दोनों के बीच तीसरी नाड़ी सुषुम्ना है। इस प्रकार हठयोग वह क्रिया है जिसमें पिंगला और इड़ा नाड़ी के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कराकर ब्रह्मरन्ध्र में समाधिस्थ किया जाता है ।
अर्थात जिसमें प्राण और अपान, नाद और बिन्दु, जीवात्मा और परमात्मा एक हो जाता है। उसी को घट अवस्था या हठयोग कहते हैं । जब प्राणायाम और बंध का अभ्यास कर अपान को ऊपर खींचकर प्राण में मिलाया जाता है तो यह हठयोग साधना कहलाती है ।
कौन है हठ योग के जनक
गोरखनाथ आठवीं से बरहवीं सदी का एक हठयोगी थे। इतिहासकारों के अनुसार इनका जन्म बंगाल में हुआ था। गुरु गोरखनाथ के बारे में ऐसा कहा जाता है कि योग बल से मृत्यु को जीत चुके थे। इनके गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे और उनके गुरु शिव थे। शिव को नाथ परंपरा में आदिनाथ कहा जाता है। गुरु गोरखनाथ की गिनती कुछ सिद्धयोगी महापुरुषों में होती है। इन्हें हठयोग का आचार्य कहा जाता है। कई लोग ये भी मानते हैं कि भगवान शिव ने ही कलियुग में योग सीखने के लिए गोरखनाथ के रूप में अवतार लिया।
आमतौर पर हठयोग का मतलब यह होता है कि कोई ऐसा योग जो अपनी क्षमता से परे जाकर करना। हठयोग में आने वाले अक्षर ‘ह’ और ‘ठ’ क्रमशः सूर्य (अग्नि) और चंद्रमा (शीतलता) से संबंधित है। इसके अलावा ये शरीर के पिंगला और इड़ा से भी संबंधित है। गोरखनाथ के अनुसार हठयोग का लक्ष्य केवल समाधि प्राप्ति के लिए है। मान्यता है कि बिना हठयोग के समाधि सिद्ध नहीं होती है। कहते हैं कि अगर हठयोग करते हुए साधक समाधि में न जाए तो यह बेकार है। साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना शुरू हुई।
इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ के बाद गोरखनाथ को माना जाता है। कहते हैं कि गोरक्षनाथ ने ही हठयोग की परंपरा शुरू की। पतंजलि के अष्टांग योग जहां समाप्त होता है उसके आगे से गोरखनाथ के हठयोग की प्रक्रिया शुरू होती है। आज हम हम जितने भी आसन, प्राणायाम, षट्कर्म, मुद्रा, नादानुसंधान या कुंडलिनी जागरण आदि योग की बात सुनते हैं, ये सभी इन्हीं की देन है। साधनाओं की बात करते हैं, सब इन्हीं की देन है।










