दो दिवसीय जयपुर डांस कॉन्क्लेव का भव्य समापन, भारत की नृत्य परंपराओं की विविधता और गहराई से रूबरू हुआ दर्शक वर्ग

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आरआईसी में आयोजित पहले संस्करण में प्रस्तुत हुए कथक, ओडिसी, मोहिनीयट्टम, लोक-संगीत और बच्चों के लिए खास वर्कशॉप

जयपुर, 23 नवंबर। राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (आरआईसी) में आयोजित जयपुर डांस कॉन्क्लेव (JDC) के पहले संस्करण का शनिवार को प्रेरक और कलात्मक वातावरण में समापन हुआ। आर्टस्पॉट्स की इस पहल को पर्यटन विभाग, राजस्थान सरकार; राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद (राजीविका), ग्रामीण विकास विभाग तथा राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर का सहयोग प्राप्त था। दो दिनों तक चले इस कॉन्क्लेव ने भारत की विविध नृत्य शैलियों, आध्यात्मिक अभिव्यक्तियों, लोक-संस्कृति और समकालीन कलात्मक प्रयोगों को एक ही मंच पर साकार किया।

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गुरुओं की पैनल चर्चा

दूसरे दिन की शुरुआत पैनल चर्चा ‘द वे फ़ॉरवर्ड – न्यू डायरेक्शन्स इन कोरियोग्राफी एंड डांस पेडागॉजी’ से हुई। इस चर्चा में पद्मश्री लीला सैमसन, पद्मश्री माधवी मुद्गल और प्रेरणा श्रीमाली ने नृत्य के बदलते स्वरूप, अनुशासन, नृत्य-शिक्षा और शास्त्रीय कला की मूल भावना पर अपने विचार साझा किए। कला इतिहासकार दीप्ति शशिधरन ने सत्र का संयोजन किया। गुरुओं ने नृत्य की मूल संरचना—ताल, राग, भाव, मुद्रा और तकनीक—को आज की पीढ़ी के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार बताया।

किताब ‘Wild Women’ पर अनूठा कला-संगम

कॉन्क्लेव में लेखक अरुंधति सुब्रहमण्यम की पुस्तक ‘Wild Women’ पर केंद्रित एक काव्य–संगीत–नृत्य प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। रूपा भवानी, मीरा बाई और जनाबाई जैसी कवयित्रियों की आध्यात्मिक कविताओं को गायिका सुधा रघुरमन और नृत्यांगना दक्षिणा वैद्यनाथन ने भावपूर्ण प्रस्तुतियों में पिरोया। इस सत्र का संचालन अखिला कृष्णमूर्ति ने किया।

बच्चों के लिए विशेष वर्कशॉप ‘When Walls Dance’

7 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए आयोजित इस रचनात्मक वर्कशॉप में भरतनाट्यम कलाकार प्राची साथी ने वर्ली आर्ट, स्टोरीटेलिंग, एनीमेशन और नृत्य का बेहतरीन संगम प्रस्तुत किया। ‘When Walls Dance’ के माध्यम से बच्चों को कला और प्रकृति संरक्षण की महत्वपूर्ण सीख देते हुए नृत्य की नई विधाओं से अवगत कराया गया।

राजस्थान की लोक-संगीत परंपरा पर रोचक सत्र

लोक-संस्कृति विशेषज्ञ विनोद जोशी और कथक कलाकार गौरी दिवाकर के बीच हुए संवाद ने दर्शकों को राजस्थान की पारंपरिक परफॉर्मिंग आर्ट्स से रूबरू कराया। सत्र का विशेष आकर्षण कालबेलिया कला पर चर्चा और कलाकारों की लाइव प्रस्तुति रही। विनोद जोशी ने राजस्थान की स्वदेशी परंपराओं के अपने दो दशकों के शोध अनुभव साझा किए।

कथक, ओडिसी और मोहिनीयट्टम की मनमोहक प्रस्तुतियां

  • जयपुर कथक केंद्र की ‘नृत्य तरंग’ प्रस्तुति में शिव स्तोत्रम्, धम्मार और तीनताल के माध्यम से जयपुर घराने की शुद्धता और ऊर्जा को प्रदर्शित किया गया।

  • शाम को ‘मंथन’ प्रस्तुति में दिव्या वारियर और अक्षय गांधी ने राजस्थान की कावड़ कथा को केरल की मोहिनीयट्टम शैली से जोड़ते हुए मिथक, मन–देह और कला की आध्यात्मिक यात्रा को मंच पर जीवंत किया।

  • समापन ओडिसी नृत्य प्रस्तुति ‘विस्तार’ से हुआ, जिसमें पद्मश्री माधवी मुद्गल की शिष्याओं ने पारंपरिक संरचनाओं को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया। समूह नृत्य, नृत्त और अभिनय के सुंदर संयोजन ने दर्शकों को ओडिसी की गहराई का सजीव अनुभव कराया।

पहले संस्करण के सफल समापन के बाद जयपुर डांस कॉन्क्लेव ने खुद को एक ऐसे मंच के रूप में स्थापित किया है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता, शोध और संवेदना, और कला और अनुभव का अनूठा मिलन होता है। दर्शकों, कलाकारों और विशेषज्ञों के लिए यह कॉन्क्लेव भारतीय नृत्य परंपरा की व्यापकता को समझने और उसकी निरंतरता को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर सिद्ध हुआ।

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