(उजला दर्पण सीनियर रिपोर्टर रामगोपाल सिंह उईके)
बैतूल। क्या सरकारी कुर्सी पर बैठते ही आदमी कानून से ऊपर हो जाता है? क्या स्वास्थ्य विभाग अब गुंडई का अड्डा बन गया है?
बैतूल जिले में पदस्थ सेनेटरी कर्मचारी गोपाल मालवीय ने एक वरिष्ठ पत्रकार को खुलेआम धमकी दी — और जब सवाल पूछे गए, तो विभाग के उच्च अधिकारी CHMO राजेश परिहार ने भी आंखें फेर लीं।
खुलेआम धमकी, बेहिसाब अकड़
घटना जिले के एक गांव की है। वरिष्ठ पत्रकार रामगोपाल सिंह ऊईके किसी रिपोर्ट पर काम कर रहे थे। उसी दौरान उनकी मुलाकात गोपाल मालवीय से हुई। बातों-बातों में मालवीय ने सारी हदें पार करते हुए कहा –
“तुम जैसे 100 पत्रकार मेरे आगे-पीछे घूमते हैं… जो करना है कर लो, मेरा कोई कुछ नहीं उखाड़ सकता।”
यही नहीं, उसने खुद को ‘सेनेटरी विभाग’ का कर्मचारी बताते हुए दावा किया –
“मैं सब पैसों से खरीद लेता हूं। किसी से डरता नहीं हूं।”
पत्रकार ने संयम बरतते हुए भाषा पर ध्यान देने को कहा, लेकिन मालवीय का रुख और उग्र हो गया।
ऑडियो रिकॉर्डिंग में धमकी दर्ज
जब मामला उजाला दर्पण के स्टेट हेड तक पहुंचा, उन्होंने गोपाल मालवीय से बात करनी चाही। लेकिन जवाब मिला –
“तुम मुझे क्यों फोन कर रहे हो, जो करना है कर लो।”
इसके बाद फोन काट दिया गया। पूरी बातचीत रिकॉर्ड में है।
CHMO का रवैया भी सवालों के घेरे में।
पूरी घटना की जानकारी जब CHMO राजेश परिहार को दी गई तो उन्होंने बोला कि आप एक शिकायत पत्र लिखकर डाक के माध्यम से भेज दीजिए।
30 मई को शिकायत पत्र डाक सेवा से CHMO राजेश परिहार को प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि सिविल सर्जन के माध्यम से कार्रवाई होगी।
लेकिन 5 जून को जब स्टेट हेड ने अपडेट मांगा, तो जवाब मिला –
“गणेश सिसोदिया कार्रवाई करेंगे, उनसे पूछ लीजिए।”
जब संपर्क सूत्र मांगा गया, तो CHMO ने बात घुमा दी और कहा –
“जवाब दूंगा, लेकिन कब — इसका कोई समय नहीं है।”
सवाल बड़ा है
क्या अब स्वास्थ्य विभाग में खुलेआम धमकी देना सामान्य बात हो गई है?
क्या पैसे और पद के घमंड में चूर कर्मचारी को विभाग का संरक्षण मिला हुआ है?
और सबसे अहम – एक जिम्मेदार अधिकारी अगर जवाब देने से बचता है, तो जनता किससे उम्मीद करे?
पत्रकारों ने दी चेतावनी
स्थानीय पत्रकारों ने साफ कर दिया है — इस बार चुप नहीं बैठेंगे।
उजाला दर्पण की टीम अब पूरे मामले की तह तक जाएगी। जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा जाएगा। सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत भी होगी।
और अगर जरूरत पड़ी, तो पत्रकार सड़कों पर उतरकर विरोध भी करेंगे।
अब जिम्मेदारी प्रशासन की
सवाल सीधा है —
क्या गोपाल मालवीय पर सख्त कार्रवाई होगी? या यह मामला भी ‘फाइलों की मौत’ मरेगा?
जवाब अब जिला प्रशासन को देना है। देर की तो जनता और पत्रकार दोनों जवाब मांगेंगे — और तब कोई बचा नहीं पाएगा।












