आखिर किसने पंडित नेहरू को ही भाषण देने से रोक दिया
जानिए कौन थे ‘फॉदर ऑफ लोकसभा’
क्यों व किसने दी ‘फॉदर ऑफ लोकसभा’ की उपाधि
18 वी लोकसभा के गठन के साथ ही लोकसभा स्पीकर की नियुक्ति की चर्चायें जोरों से चलने लगी थी। कोई राजनाथ सिंह तो कोई के सुरेश तो कोई किसी अन्य कद्दावर नेता को लोकसभा स्पीकर बनाये जाने के कयास लगाये जा रहे थे।
इन सभी अटकलों पर बुधवार को विराम चिन्ह लग गया । जब बतौर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक बार फिर से प्रत्याशी बनाया और सर्वसम्मति से लोकसभा अध्यक्ष चुना गया।
आज हम उस लोकसभा स्पीकर की बात करेंगे जिन्हें ‘फॉदर ऑफ लोकसभा’ कहा जाता है। आप सभी जानते हैं कि अब तक लोकसभा की कुर्सी पर 18 स्पीकर विराजमान हो चुके हैं। वर्तमान में लोकसभा के 19वें स्पीकर ओम बिरला हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लोकसभा के पहले स्पीकर कौन थे?
लोकसभा के पहले स्पीकर गणेश वासुदेव मावलंकर थे जिन्हें ‘फॉदर ऑफ लोकसभा’ और ‘दादा साहेब’ जैसे उपनामों से भी जाना जाता है। लोग उन्हें प्यार से दादा साहेब बुलाते थे। ‘फॉदर ऑफ लोकसभा’ का खिताब मिलने के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है।

क्यों व किसने दी ‘फॉदर ऑफ लोकसभा’ की उपाधि
दरअसल, लोकसभा का अध्यक्ष बनने के बाद गणेश वासुदेव मावलंकर ने ऐसा भाषण दिया जिसने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को प्रभावित किया। जब उन्हें लोकसभा ने चुना, तो संसद के 394 सदस्यों का समर्थन मिलने की संतुष्टि से वह प्रफुल्लित हो गए। उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास था, लेकिन वह इतने भावुक हो गए कि स्पीकर की कुर्सी पर खड़े होकर जोरदार भाषण दिया। उन्होंने अंत में कहा कि एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी से कार्य करने का भाव ही हमें नतीजे देगा। नेहरू ने मावलंकर का यह भाषण सुनकर उन्हें ‘फॉदर ऑफ लोकसभा’ की उपाधि दी। जीवी मावलंकर आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार आज भी लोगों के जेहन में जिंदा हैं।
पहली बार हुआ लोकसभा का चुनाव
देश के इतिहास में स्पीकर के पद को लेकर पहली बार साल 1952 में चुनाव हुआ था। उस समय कांग्रेस की ओर से जवाहरलाल नेहरू ने जीवी मावलंकर का नाम स्पीकर के उम्मीदवार के तौर पर आगे रखा। वहीं एसके गोपालन ने शंकर शांताराम मोरे का नाम स्पीकर के पद के उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तावित किया। बाद में वोटिंग हुई। मावलंकर के समर्थन में 394 वोट पड़े जबकि विरोध में 55 वोट गए। लेकिन इसमें सबसे दिलचस्प बात यह रही कि शांता राम मोरे ने भी मावलंकर के पक्ष में वोट किया। उन्होंने कहा कि यह संसद की परंपरा के अनुरूप होगा कि दो उम्मीदवार जो एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं, वे एक-दूसरे को ही वोट करें।
अपनी निष्पक्षता के लिए थे मशहूर
मावलंकर अपनी निष्पक्षता के लिए मशहूर थे। कांग्रेस के सदस्य होने के बावजूद उन्हें किसी भी पार्टी के सदस्य के तौर पर नहीं देखा जाता था। जीवी मावलंकर एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने देश को आजादी दिलाने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। भारत को आजादी मिलने के बाद संविधान 1950 में लागू हुआ। पहले लोकसभा चुनाव के बाद 1952 में पहली लोकसभा का गठन हुआ। उसके बाद सबसे बड़ी चुनौती स्पीकर के चुनाव की थी। लोकसभा के संचालन में अध्यक्ष का काम बहुत ही जिम्मेदारियों से भरा और संवेदनशील होता है। इस पद को संभालने के लिए जीवी मावलंकर से बेहतर कोई और नहीं हो सकता था, इसलिए उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई।
नेहरू को ही भाषण देने से रोक दिया
जीवी मावलंकर के खिलाफ साल 1954 में अविश्वास प्रस्ताव भी लाया गया, लेकिन लोकसभा ने उसे अस्वीकार कर दिया। मावलंकर अक्सर प्रधानमंत्री के साथ असहमत होते थे। उदाहरण के तौर पर, अध्यादेश के मुद्दे पर नेहरू और मावलंकर के विचार बिल्कुल अलग थे। मावलंकर ने कहा था कि यह काम करने का लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। केवल असाधारण परिस्थितियों में ही सरकार अध्यादेश ला सकती है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसएल शकधर ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा था कि मावलंकर ने नेहरू को दूसरा बयान देने से रोक दिया था, क्योंकि यह लोकसभा के नियमों का उल्लंघन था। नेहरू ने उनके फैसले के सामने शालीनता से सिर झुकाया।










