सिसकती विरासत: क्या रविंद्र रंगमंच के इन खंडहरों में दफन हो जाएगी राजस्थान की कला और संस्कृति?

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जयपुर। कभी जिसकी गूंज देश-विदेश तक सुनाई देती थी, जहाँ मंच की धूल को कलाकार अपने माथे का तिलक मानते थे, आज वही रविंद्र रंगमंच अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जिस मंच से राजस्थान की रंगकला, संगीत और नाट्य परंपरा ने नई ऊँचाइयाँ पाईं, आज वहाँ सन्नाटा पसरा है। तालियों की गड़गड़ाहट, रोशनी और सुर-ताल की जगह कबूतरों की बीट, गंदगी और आवारा जानवरों का डेरा दिखाई देता है। यह हालात केवल एक इमारत की दुर्दशा नहीं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं।

35 सालों का सूखा: तकनीक के बिना ‘बेजान’ हुआ मंच

रविंद्र रंगमंच की सबसे बड़ी त्रासदी उसकी व्यवस्थागत उपेक्षा है। बीते 35 वर्षों से तकनीकी कर्मचारियों की कोई नई भर्ती नहीं हुई। नतीजतन, सेवानिवृत्त हो चुके अनुभवी कर्मियों को ही मजबूरी में लाइट और साउंड संभालने के लिए बुलाया जाता है। नियमित स्टाफ के अभाव में संचालन निजी इच्छाओं और छुट्टियों पर निर्भर हो गया है। यह रंगमंच आज ऐसे जहाज़ की तरह है, जिसका न तो स्थायी कप्तान है और न ही दिशा—और कला का यह मंदिर सरकारी औपचारिकता बनकर रह गया है।

खंडहर बनती इमारत: कला की वेदी पर मंडराता खतरा

रंगमंच की इमारत अब ‘डेथ ट्रैप’ जैसी स्थिति में पहुँच चुकी है।

  • जर्जर ढांचा: सीढ़ियाँ टूट रही हैं, छज्जे और छत कभी भी गिर सकते हैं।

  • असुरक्षित माहौल: कलाकारों के लिए रिहर्सल करना जान जोखिम में डालने जैसा है।

  • गंदगी का अंबार: मंच और बैकस्टेज पर अब कला नहीं, जानवरों का कब्ज़ा दिखता है।

एक स्थानीय रंगकर्मी का कहना है, “मंच पर कदम रखते ही रूह काँप जाती है। डर लगता है कि प्रदर्शन के बीच छत न गिर जाए। क्या हमारी संस्कृति की कीमत इतनी कम रह गई है?”

बजट का भेदभाव: जेकेके को ‘घी-शक्कर’, रविंद्र मंच को ‘सूखी रोटी’

कलाकारों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि बजट वितरण में भेदभाव रविंद्र रंगमंच को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। जहाँ जवाहर कला केंद्र को नियमित बजट, रखरखाव और वीआईपी सुविधाएँ मिलती हैं, वहीं रविंद्र रंगमंच उपेक्षा का शिकार है। कलाकारों का आरोप है कि भ्रष्टाचार और असंगत बजट आवंटन के चलते कलाकार-उत्थान के नाम पर आने वाली राशि फाइलों में ही दम तोड़ देती है, जबकि ज़मीनी स्तर पर कुछ नहीं बदलता।

विरासत की अनदेखी: संवेदनशीलता पर गहरा प्रहार

विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी प्रदेश की पहचान उसकी संस्कृति से बनती है। नाटक, संगीत, नृत्य और ललित कलाओं के ज़रिये रविंद्र रंगमंच ने दशकों तक राजस्थान का मान बढ़ाया। आज जब कलाकार सुरक्षित, व्यवस्थित और तकनीकी रूप से सक्षम मंच की मांग कर रहे हैं, तब प्रशासन की चुप्पी सरकारी संवेदनशीलता पर सवाल उठाती है।

कब जागेगी सरकार?

रविंद्र रंगमंच सिर्फ ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि हज़ारों कलाकारों की स्मृतियों, साधना और पहचान का केंद्र है। यदि समय रहते इसकी संरचनात्मक मरम्मत, तकनीकी उन्नयन, नियमित स्टाफ भर्ती और पारदर्शी बजट व्यवस्था नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी। सवाल साफ़ है—क्या राजस्थान सरकार इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएगी, या एक गौरवशाली सांस्कृतिक इतिहास मलबे में तब्दील हो जाएगा?

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