शिक्षा में नेतृत्व की नई दिशा: तीन दिवसीय ऑनलाइन फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम ने खोले नवाचार के द्वार

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जयपुर, 4 अप्रैल। शिक्षा केवल ज्ञान देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण, मूल्यों के संवर्धन और समाज को दिशा देने का सशक्त माध्यम है। इसी सोच को साकार रूप देते हुए आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) के तत्वावधान में “व्यावसायिक कौशल एवं नेतृत्व विकास” विषय पर तीन दिवसीय ऑनलाइन फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम (FDP) का सफल आयोजन 2 अप्रैल से 4 अप्रैल 2026 तक किया गया। यह कार्यक्रम संजय टीचर्स ट्रेनिंग (पीजी) कॉलेज, जयपुर, मेहता टीचर ट्रेनिंग कॉलेज, जयपुर एवं श्री बालाजी टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, जयपुर के संयुक्त प्रयासों से संपन्न हुआ।

यह आयोजन न केवल शिक्षकों के लिए एक प्रशिक्षण मंच था, बल्कि एक ऐसा बौद्धिक संगम भी था, जहां विचारों, अनुभवों और नवाचारों का आदान-प्रदान हुआ। कार्यक्रम ने शिक्षकों को उनके पेशेवर जीवन में नई ऊर्जा, दृष्टिकोण और कौशल प्रदान किए।

उद्घाटन सत्र: ज्ञान और प्रेरणा का संगम-

कार्यक्रम का शुभारंभ संजय टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। यह दृश्य भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक शिक्षा के सुंदर समन्वय का प्रतीक था। उद्घाटन सत्र में प्राचार्य प्रो. सुनीता भार्गव ने सभी अतिथियों एवं वक्ताओं का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।

अपने स्वागत भाषण में उन्होंने कहा कि— “आज के बदलते शैक्षिक परिवेश में शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह एक मार्गदर्शक, प्रेरक और नवाचार का वाहक बन चुका है। ऐसे में इस प्रकार के कार्यक्रम शिक्षकों को निरंतर उन्नयन के लिए प्रेरित करते हैं।”

मुख्य वक्ता का प्रेरणादायक उद्बोधन:

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. गोपीनाथ शर्मा ने अपने विचार साझा किए। उन्होंने शिक्षा के व्यापक परिप्रेक्ष्य को स्पष्ट करते हुए कहा—
“एक शिक्षक केवल ज्ञान का प्रसारक नहीं, बल्कि समाज के भविष्य का निर्माता होता है। वह विद्यार्थियों के भीतर न केवल जानकारी, बल्कि मूल्य, संस्कार और सोच विकसित करता है।”

उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्तमान समय में शिक्षा प्रणाली में तकनीकी समावेशन के साथ-साथ भारतीय परंपराओं और मूल्यों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
उनका मानना था कि—
“जब आधुनिक तकनीक और भारतीय संस्कृति का संतुलन स्थापित होगा, तभी शिक्षा वास्तव में समग्र और प्रभावी बन सकेगी।”

समय प्रबंधन और आत्मविकास पर विशेष सत्र:

कार्यक्रम के दूसरे महत्वपूर्ण वक्ता डॉ. मनोज झाझड़िया ने शिक्षकों के जीवन में समय प्रबंधन और आत्मविश्वास की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा—
“समय ही सबसे बड़ा संसाधन है। जो शिक्षक अपने समय का सही उपयोग करता है, वही अपने विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है।”

उन्होंने कार्य-जीवन संतुलन की आवश्यकता पर जोर देते हुए बताया कि एक शिक्षक को अपने व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।
उनके अनुसार—
“एक संतुलित और आत्मविश्वासी शिक्षक ही कक्षा में सकारात्मक ऊर्जा और प्रभावी शिक्षण वातावरण का निर्माण कर सकता है।”

नेतृत्व और टीम बिल्डिंग: आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता- 

डॉ. सीमा दायमा ने अपने व्याख्यान में नेतृत्व क्षमता, टीम वर्क और सहयोगात्मक अधिगम (Collaborative Learning) के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि आज के समय में शिक्षा केवल एकतरफा प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक सहभागिता आधारित प्रणाली बन चुकी है।

उन्होंने कहा—“प्रभावी नेतृत्व के बिना कोई भी शिक्षण प्रक्रिया सफल नहीं हो सकती। शिक्षक को एक लीडर की तरह सोचने और कार्य करने की आवश्यकता है, जो विद्यार्थियों को प्रेरित कर सके और उन्हें सक्रिय भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करे।”

उन्होंने कक्षा प्रबंधन के आधुनिक तरीकों पर भी प्रकाश डाला और बताया कि सहयोगात्मक अधिगम से विद्यार्थियों में संवाद कौशल, टीम भावना और समस्या समाधान की क्षमता विकसित होती है।

अन्य वक्ताओं के विचार: सतत अधिगम की ओर कदम-

कार्यक्रम में डॉ. मौसम पारीक, डॉ. मनोज कुमार शर्मा एवं डॉ. मंजू देवी ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। इन सभी वक्ताओं ने शिक्षकों के लिए निरंतर अधिगम (Continuous Learning) और व्यावसायिक विकास के महत्व को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा—“आज का शिक्षक केवल विषय विशेषज्ञ नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, प्रेरक और जीवन पर्यंत सीखने वाला व्यक्ति होना चाहिए। तभी वह विद्यार्थियों को बदलती दुनिया के अनुरूप तैयार कर सकता है।”

इन सत्रों में शिक्षकों को नई शिक्षण तकनीकों, डिजिटल उपकरणों और नवाचार आधारित शिक्षण विधियों के बारे में जानकारी दी गई, जिससे वे अपने शिक्षण को और अधिक प्रभावी बना सकें।

कार्यक्रम का संचालन और समन्वय:

इस सफल आयोजन के पीछे संस्थानों के प्राचार्यों और समन्वयकों का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम का मार्गदर्शन प्रो. सुनीता भार्गव, डॉ. सुमन चौधरी एवं डॉ. संजू द्वारा किया गया।

कार्यक्रम की समन्वयक डॉ. अंजना अग्रवाल, डॉ. मीनाक्षी जांदू एवं श्रीमती बबीता जांगिड़ ने आयोजन को सुव्यवस्थित रूप से संचालित किया। वहीं सह-समन्वयक डॉ. अल्पना शर्मा, श्रीमती आरती एवं श्रीमती सुनीता शर्मा ने तकनीकी एवं प्रबंधन संबंधी जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया।

प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी:

इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में विभिन्न शिक्षण संस्थानों के 200 से अधिक प्राध्यापकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रत्येक सत्र में प्रतिभागियों ने सक्रिय रूप से प्रश्न पूछे, अपने अनुभव साझा किए और वक्ताओं के साथ संवाद स्थापित किया।

यह सहभागिता इस बात का प्रमाण थी कि शिक्षक वर्ग अपने पेशेवर विकास के प्रति सजग और प्रतिबद्ध है।

ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक अनुभव:

कार्यक्रम के सभी सत्र अत्यंत ज्ञानवर्धक, संवादात्मक और प्रेरणादायक रहे। प्रतिभागियों ने इसे एक उपयोगी और प्रभावी पहल बताया, जिसने उनके शिक्षण दृष्टिकोण को व्यापक बनाया।

कई प्रतिभागियों ने कहा कि—“इस कार्यक्रम ने हमें न केवल नई तकनीकों से परिचित कराया, बल्कि हमें अपने भीतर छिपी नेतृत्व क्षमता को पहचानने का अवसर भी दिया।”

समापन सत्र: आभार और संकल्प:

कार्यक्रम के समापन सत्र में सभी वक्ताओं, आयोजकों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। इस अवसर पर यह संकल्प भी लिया गया कि भविष्य में भी इस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा, ताकि शिक्षकों का निरंतर विकास सुनिश्चित किया जा सके।

शिक्षा में नवाचार की ओर एक सशक्त पहल:

यह तीन दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि शिक्षक अपने कौशल, नेतृत्व क्षमता और दृष्टिकोण को निरंतर विकसित करते रहें, तो वे शिक्षा को एक नई दिशा दे सकते हैं।

आज जब शिक्षा प्रणाली तेजी से बदल रही है, ऐसे में इस प्रकार के कार्यक्रम न केवल शिक्षकों के लिए आवश्यक हैं, बल्कि समाज के समग्र विकास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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