“जबलपुर में सफाई का तमाशा — गंदगी ढकने की कला में माहिर हुए हम”।

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जबलपुर। जोन 02 । यहाँ सफाई नहीं होती, सफाई का अभिनय होता है।कूड़े के ढेर वही हैं, बस ऊपर से झाड़ू की दो लकीरें खींच दी जाती हैं ताकि कैमरे को लगे — “देखो, स्वच्छ जबलपुर!” जोन क्रमांक 2 का नया अड्डा 17 मंजिल से नाले तक बना डम्मपिंग पॉइंट। और भी कई जगह है लेकिन जोन प्रभारी और सुपरवाइजर तो ऐसे देखते है जैसे सब चमक रहा है। शहर में इन दिनों सफाई के नाम पर “ढोंग धतूरा” चल रहा है —लोग कूड़ा ढूंढते हैं, अफसर सफाई ढूंढते हैं, और जनता अपने टैक्स का हिसाब।कुछ दिन सफाई का ढोल बजता है, उसके बाद वही पुरानी गंध, वही पुराना ढर्रा —बस नारा नया: “स्वच्छता में जबलपुर नंबर वन!”कर्मचारी कहते हैं — काम चल रहा है।अफसर कहते हैं — सब चमक रहा है।और जनता कहती है — “हम तो बस गड्ढों और कूड़े के बीच चमक रहे हैं।”शहर की गलियां अब भी नालों की नालियों में बह रही हैं,लेकिन फेसबुक और प्रेस नोट में जबलपुर स्वर्ग दिखता है। कहने को सफाई अभियान है,

असल में ये “एवार्ड अभियान” है —जहाँ मेहनत कम, तस्वीरें ज़्यादा चलती हैं।“स्वच्छता का दिखावा हमारा नया धर्म बन चुका है,गंदगी फैलाना हमारी पुरानी पहचान।”जब कैमरे बंद होते हैं,तो झाड़ू भी रख दी जाती है —और फिर शुरू होती है वही गंध की गाथा, वही ढोल की धन और वही ढोंग का दंगल।

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