( उजला दर्पण सीनियर रिपोर्टर रामगोपाल सिंह उईके )
जबलपुर महाकौशल के सबसे बड़े अस्पताल नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल काॅलेज में खून का सौदा हो रहा है। यहां पर जरूरतमंद मरीजों को 4 से 5 हजार रुपए तक में खून बेचा जाता है।
आज शनिवार को एक सामाजिक संस्था ने गिरोह के दो सदस्यों को रंगे हाथों पकड़ा और उन्हें गढ़ा थाना पुलिस के हवाले किया है।
सामाजिक संस्था के सदस्यों ने जब जरूरतमंद बनकर इनसे खून मांगा तो इनका कहना था कि अभी रुपए दे दो, कुछ देर में ब्लड लाकर दे देंगे।
गिरफ्त में आए युवक अन्नू और जाॅनसन जबलपुर के ही रहने वाले हैं। ये दोनों मेडिकल काॅलेज में लंबे समय से सक्रिय है। इस गिरोह की एक पूरी चेन है, जिसमें 50 से अधिक लोग शामिल हैं। ये खून निकालने से लेकर बेचने तक का काम करते हैं।
गिरोह के सदस्य ने अब तक कई लोगों को खून बेच चुके हैं। इधर, गढ़ा थाना पुलिस ने दोनों के खिलाफ जांच शुरू कर दी है।
दलालों को काफी हाउस में बुलाया
दरअसल, जबलपुर की एक सामाजिक संस्था गरीब और जरूरतमंद मरीजों को नि:शुल्क ब्लड की व्यवस्था करती है। कुछ दिनों से लगातार उन्हें यह जानकारी मिल रही थी कि इलाज के लिए आए मरीजों के परिजन बाहर से आने वाले लोगों से ब्लड ले रहे हैं। वे उन्हें 4 से 5 हजार रुपए में खून बेच रहे हैं।
आरोपियों को पकड़ने के लिए मेडिकल सुरक्षा विभाग की भी मदद ली गई। शनिवार को ग्रुप की दो महिलाएं मरीज की परिजन बनकर घूमते हुए ब्लड खरीदने की बात कर रही थी।
जैसे ही जानकारी खून बेचने वाले दलालों तक पहुंची। वे संस्था की इन 2 महिलाओं के पास काफी हाउस में पहुंचे। उसी दौरान अन्नू और जाॅनसन उनके पास आए और एक यूनिट का 5 हजार रुपए मांगते हुए ब्लड की व्यवस्था करने को कहा।
मरीज के परिजन बनी संस्था की सदस्य नेहा शर्मा ने जब अर्जेंट बताते हुए ब्लड चाहा तो दलालों ने रेट बढ़ा दिया।
फोटो दिखाई-घेराबंदी कर दी
धनवंतरी नगर निवासी खून के सौदागर अन्नू और जाॅनसन जब महिलाओं से ब्लड की डील कर रहे थे, उस दौरान काॅफी हाउस के बाहर सुरक्षाकर्मी और संस्था के सदस्य इकट्ठा हो गए थे।
अंदाजा यह भी था कि असलियत सामने आते ही दोनों मेडिकल काॅलेज कैंपस से भागने की कोशिश करेंगे। हर गेट पर बाउंसर और गार्ड तैनात किए गए। संस्था के सदस्य पहले ही सुरक्षाकर्मियों को दलालों की फोटो दे चुके थे। जिसके चलते जैसे ही दोनों आरोपी काॅफी हाउस से बाहर निकले तो गार्ड ने उन्हें पकड़कर गढ़ा पुलिस के हवाले कर दिया।
मेडिकल सुरक्षा विभाग के सीएसओ विकास नायडू ने बताया कि दोनों ने भागने की कोशिश की थी, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए।
गिरोह में 50 से अधिक लोग
सामाजिक संस्था के सदस्य राहुल तिवारी ने बताया कि हमारी संस्था थैलेसिमिया से पीड़ितों के साथ-साथ गरीब जरूरतमंद मरीजों को ब्लड उपलब्ध करवाती है।
हाल ही में देखा गया कि दूर-दराज से अपने परिजनों को लेकर इलाज के लिए मेडिकल काॅलेज आने वाले लोगों को ब्लड बैंक से खून नहीं मिलता है, तो वे दलालों के संपर्क में आ जाते हैं।
कुछ दिनों से लोग बाहर से ब्लड लाकर दे रहे थे। संदेह होने के बाद प्लान बनाया और पता करने की कोशिश की थी कि आखिरकार ये लोग कहां से ब्लड ला रहे हैं।
राहुल तिवारी का कहना है कि गिरोह की लंबी चैन है। जिसमें 50 से अधिक लोग शामिल हैं। ये यहां-वहां या फिर ब्लड बैंक से खून लाकर मरीजों के परिजनों को बेचा करते हैं।
कहां से लाते है खून-जांच जारी है
सीएसपी आशीष जैन का कहना है कि कुछ लोग गढ़ा थाने आए थे। उन्होंने दो युवक अन्नू और जाॅनसन को सौंपा है। दोनों पर आरोप है कि ये मेडिकल काॅलेज में खून बेचते हैं।
अभी तक की जांच में पता चला है कि इनके ब्लड बैंक में संपर्क है। कुछ बाहरी लोग भी हैं, जिनसे ये ब्लड लेकर आते हैं। अभी दोनों से पूछताछ जारी है। पता किया जा रहा है, कि अब तक कितने लोगों को इन्होंने खून बेचा है, और कहां से ये लेकर आते थे।
अपराधी हैं खून बेचने वाले
नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल काॅलेज में खून की तस्करी से हड़कंप मच है। मेडिकल प्रबंधन ने भी मामले की जांच शुरू कर दी है। मेडिकल काॅलेज के डीन डाॅ. नवनीत सक्सेना का कहना है कि यह एक गंभीर अपराध है। खून बेचने वाले लोगों पर सख्त कार्रवाई होना चाहिए।
मेडिकल काॅलेज में खून या किसी भी तरह के अवैध सौदेबाजी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अस्पताल प्रशासन ने सुरक्षा एजेंसी को निर्देश दिया है कि ब्लड बैंक के आसपास निगरानी और कड़ी की जाए। आने वाले हर संदिग्ध व्यक्ति की जांच की जाए।
सवालों के घेरे में ब्लड बैंक
मेडिकल काॅलेज में इससे पहले भी खून के सौदागर पकड़े जा चुके हैं और उन पर कार्रवाई भी की गई, इसके बाद भी गिरोह का काम बंद नहीं हुआ।
इधर, इस पूरे प्रकरण में ब्लड बैंक के अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है। जबलपुर मेडिकल अस्पताल में बार-बार सामने आ रहे खून के काले कारोबार के मामले न केवल अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि जरूरतमंद मरीजों के नाम पर अवैध कमाई का नेटवर्क सक्रिय हैं।












